Guruvaani - 727

जीवत लउ बिउहारु है जग कउ तुम जानउ ॥ नानक हरि गुन गाइ लै सभ सुफन समानउ ॥२॥२॥

जीवत लउ = जिंदगी तक। लउ = तक। बिउहारु = व्यवहार। जग कउ = जगत को। जानउ = समझो। समानउ = समान, जैसा।2।

हे नानक! (कह: हे मन!) जगत को तू ऐसा ही समझ (कि यहाँ) जिंदगी तक ही बर्ताव-व्यवहार रहता है। वैसे भी, ये सारा सपने की तरह ही है। (इस वास्ते जब तक जीता है) परमात्मा के गुण गाता रह।2।2।


तिलंग महला ९ ॥ हरि जसु रे मना गाइ लै जो संगी है तेरो ॥ अउसरु बीतिओ जातु है कहिओ मान लै मेरो ॥१॥ रहाउ॥

जसु = महिमा। संगी = साथी। अउसरु = अवसर, (जिंदगी का) समय। बीतिओ जातु है = बीतता जा रहा है। मेरो कहिओ = मेरा कहा, मेरा वचन।1। रहाउ।

हे मन! परमात्मा के महिमा के गीत गाया कर, ये महिमा ही तेरा असल साथी है। मेरे वचन मान ले। उम्र का समय बीतता जा रहा है।1। रहाउ।


स्मपति रथ धन राज सिउ अति नेहु लगाइओ ॥ काल फास जब गलि परी सभ भइओ पराइओ ॥१॥

संपति = धन पदार्थ। सिउ = साथ। नेहु = प्यार। फास = फासी। जब = जब। गलि = गले में। परी = पड़ती है। सभ = हरेक चीज। पराइओ = बेगानी।1।

हे मन! मनुष्य धन-पदार्थ, रथ, माल, राज माल से बड़ा मोह करता है। पर जब मौत की फाँसी (उसके) गले में पड़ती है, हरेक चीज बेगानी हो जाती है।1।


जानि बूझ कै बावरे तै काजु बिगारिओ ॥ पाप करत सुकचिओ नही नह गरबु निवारिओ ॥२॥

जानि कै = जान के, जानते हुए। बूझि कै = समझ के, समझते हुए। बावरे = हे झल्ले! तै बिगारिओ = तूने बिगाड़ लिया है। काजु = काम। करत = करता। सुकचिओ = संकोचित हुआ, शर्माया। गरबु = अहंकार। निवारिओ = दूर किया।2।

हे झल्ले मनुष्य! ये सब कुछ जानते हुए समझते हुए भी तू अपना काम बिगाड़ रहा है। तू पाप करते हुए (कभी) संकोचित नहीं होता, तू (इस धन-पदार्थ का) अहंकार भी दूर नहीं करता।2।


जिह बिधि गुर उपदेसिआ सो सुनु रे भाई ॥ नानक कहत पुकारि कै गहु प्रभ सरनाई ॥३॥३॥

जिह बिधि = जिस तरीके से। गुरि = गुरु ने। रे = हे! पुकारि कै = ऊँचा बोल के। गहु = पकड़। प्रभ सरनाई = प्रभु की शरण।3।

नानक (तुझे) पुकार के कहता है: हे भाई! गुरु ने (मुझे) जिस तरह उपदेश किया है, वह (तू भी) सुन ले (कि) प्रभु की शरण पड़ा रह (सदा प्रभु का नाम जपा कर)।3।3।


तिलंग बाणी भगता की कबीर जी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

कतेब = पष्चिमी मतों की धार्मिक पुस्तक (तौरेत, ज़ंबूर, अंजील, कुरान)। इफतरा = (अरबी) मुबालग़ा, बनावट, अस्लियत से बढ़ा चढ़ा के बताई हुई बातें। फिकरु = सहम, अशांति। टुकु = थोड़ी सी। टुकु दमु = पलक भर। करारी = टिकाउ एकाग्रता। जउ = अगर। हाजिर हजूरि = हर जगह मौजूद। खुदाइ = रब, परमात्मा।1।
बंदे = हे मनुष्य! परेसानी = घबराहट। सिहरु = जादू, वह जिसकी अस्लियत कुछ और हो पर देखने को कुछ अजीब मन मोहना दिखता हो। मेला = खेल, तमाशा। दसतगीरी = (दसत = हाथ। गीरी = पकड़ना) हाथ पल्ले पड़ने वाली चीज, सदा संभाल के रखने वाली चीज। रहाउ।
दरोगु = झूठ। दरोगु पढ़ि पढ़ि = ये पढ़ के कि वेद झूठे हैं अथवा ये पढ़ के कि कतेब झूठे हैं। होइ = हो के। बेखबर = अन्जान मनुष्य। बादु = झगड़ा, बहस। बकाहि = बोलते हैं। बादु बकाहि = बहस करते हैं। हकु सचु = सदा कायम रहने वाला रब। मिआने = में। सिआम मूरति = श्याम मूर्ति, कृष्ण जी की मूर्ति। नाहि = (रब) नहीं है।2।
असमान = आकाश, दसवाँ द्वार, अंतहकर्ण, मन। मिआने = मिआने, अंदर। लहंग = लांघता है, गुजरता है, बहता है। दरीआ = (सर्व व्यापक प्रभु-रूप) नदी। गुसल = स्नान। करदन बूद = (करदनी बूद) करना चाहिए था। फकरु = फकीरी, बंदगी वाला जीवन। चसमे = ऐनकें। जह तहा = हर जगह।3।
अलाह = अल्लाह। पाकं पाक = पवित्र से भी पवित्र, सबसे पवित्र। सक = शक, भ्रम। करउ = मैं करूँ। दूसर = (उस जैसा कोई और) दूसरा। करम = बख्शश। करीम = बख्शिश करने वाला। उहु = वह प्रभु। सोइ = वह मनुष्य (जिस पर प्रभु बख्शिश करता है)।4।
टेक = ओट, सहारा। खुंदकारा = सहारा। खुंदकार = बादशाह, हे मेरे पातशाह! मसकीन = आजिज़। अधारा = आसरा।1। रहाउ।
करीमां = हे करीम! हे बख्शिश करने वाले! रहीमां = हे रहीम! ळे रहम करने वाले! गनीं = अमीर, भरा पूरा। हाजरा हजूरि = हर जगह मौजूद, प्रत्यक्ष, मौजूद। दरि = में। पेसि = सामने। दरि पेसि मनीं = मेरे सामने।1।
दिहंद = देने वाला, दाता। बिसीआर = बहुत। धनी = धनवाला। देहि = तू देता है। लेहि = तू लेता है। दिगर = कोई और, दूसरा।2।
दानां = जानने वाला। बीनां = देखने वाला। च = का। चे = के। ची = की। नामे चे = नामे के। नामे चे सुआमी = हे नामदेव के स्वामी!।3।
हले यारां = हे मित्र! हे सज्जन! खुसि = खुशी देने वाली, ठंड डालने वाली। खबरी = तेरी ख़बर, तेरी सोय (जैसे; “सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला”)। बलि बलि = सदके जाता हूँ। हउ = मैं। नीकी = सुंदर, अच्छी, प्यारी। बिगारी = वेगार, किसी और के लिए किया हुआ काम।
तेरी बिगारी = ये रोजी आदि कमाने का काम जिस में तूने हमें लगाया हुआ है। आले = आहला, ऊँचा, बड़ा, सब से प्यारा।1। रहाउ।
कुजा = (अज़) कुजा, कहाँ से? आमद = आमदी, तू आया। कुजा = कहाँ? रफती = तू गया था। मे रवी = तू जा रहा है। कुजा...मे रवी = तू कहाँ से आया? तू कहाँ गया? तू कहाँ जा रहा है? (भाव, ना तू कहीं से आया, ना तू कहीं कभी गया, और ना ही तू कहीं जा रहा है; तू सदा अटल है)। रासि = (संस्कृत: रास, a kind of dance practiced by Krishna and the cowherds but particularly the gopis or cowherdesses of Vrindavana, 2. Speech) रासें जहाँ कृष्ण जी नृत्य करते व गीत सुनाते थे। बुगोई = तू (ही) कहता है।1।
खूब = सुंदर। द्वारिका नगरी....मगोल = काहे के द्वारका नगरी, काहे के मगोल; किस लिए द्वारका नगरी में और किसलिए मुगल (-धर्म) के नगर में? ना तू सिर्फ द्वारका में है, और ना तू सिर्फ मुसलमानी धर्म केन्द्र मक्के में है।2।
चंदीं हजार = कई हजारों। आलम = दुनिया। एकल = अकेला। खानां = खान, मालिक। हम चिनी = इसी ही तरह का। हम = भी। चिनी = ऐसा। सांवले बरनां = साँवले रंग वाला, कृष्ण।3।
असपति = (अश्वपति = Lord of horses) सूर्य देवता। गजपति = इन्द्र देवता। नरह मरिंद = नरों का राजा, ब्रहमा। मुकंद = (संस्कृत: मुकुंद = मुकुं दाति इति) मुक्ति देने वाला, विष्णु और कृष्ण जी का नाम है।4।

हे भाई! (वाद-विवाद की खातिर) वेदों-कतेबों के हवाले दे-दे कर ज्यादा बातें करने से (मनुष्य के अपने) दिल का सहम दूर नहीं होता। (हे भाई!) अगर तुम अपने मन को पलक भर के लिए ही टिकाओ, तो तुम्हें सब में ही बसता ईश्वर दिखेगा (किसी के विरुद्ध तर्क करने की आवश्यक्ता नहीं पड़ेगी)।1।
हे भाई! (अपने ही) दिल को हर वक्त खोज, (बहस मुबाहसे की) घबराहट में ना भटक। ये जगत एक जादू सा है, एक तमाशे जैसा है, (इसमें से इस व्यर्थ के वाद-विवाद से) हाथ-पल्ले पड़ने वाली कोई चीज़ नहीं।1। रहाउ।
बेसमझ लोग (दूसरे मतों की धर्म-पुस्तकों के बारे में ये) पढ़-पढ़ के (कि इनमें जो लिखा है) झूठ (है), खुश हो-हो के बहस करते हैं। (पर, वे ये नहीं जानते कि) सदा कायम रहने वाला ईश्वर सृष्टि में (भी) बसता है, (ना वह अलग सातवें आसमान पर बैठा है और) ना ही वह परमात्मा कृष्ण की मूर्ति है।2।
(सातवें आसमान में बैठा समझने की जगह, हे भाई!) वह प्रभु-रूप दरिया व अंतहकर्ण में लहरें मार रहा है, तूने उसमें स्नान करना था। सो, हमेशा उसकी बँदगी कर, (ये भक्ति की) ऐनक लगा (के देख), वह हर जगह मौजूद है।3।
ईश्वर सब से पवित्र (हस्ती) है (उससे पवित्र और कोई नहीं है), इस बात पर मैं तब ही शक करूँ, अगर उस ईश्वर जैसा दूसरा और कोई हो। हे कबीर! (इस भेद को) वह मनुष्य ही समझ सकता है जिसको वह समझने के काबिल बनाए। और, ये बख्शिश उस बख्शिश करने वाले के अपने हाथ में है।4।1।
हे मेरे पातशाह! तेरा नाम मुझ अंधे की डंगोरी है, सहारा है; मैं कंगाल हूँ, मैं मसकीन हूँ, तेरा नाम (ही) मेरा आसरा है।1। रहाउ।
हे अल्लाह! हे करीम! हे रहीम! तू (ही) अमीर है, तू हर वक्त मेरे सामने है (फिर, मुझे किसी और की क्या अधीनता?)।1।
तू (रहमत का) दरिया है, तू दाता है, तू बहुत ही धन वाला है; एक तू ही (जीवों को पदार्थ) देता है, और मोड़ लेता है, कोई और ऐसा नहीं (जो ये सामर्थ्य रखता हो)।2।
हे नामदेव के पति-परमेश्वर! हे हरि! तू सब बख्शिशें करने वाला है, तू (सबके दिल की) जानने वाला है और (सबके काम) देखने वाला है; हे हरि! मैं तेरे कौन-कौन से गुण बखान करूँ?।3।1।2।
हे सज्जन! हे प्यारे! तेरी खबर ठंडक देने वाली है (भाव, तेरी कथा-कहानियाँ सुन के मुझे सकून मिलता है); मैं सदा तुझसे सदके जाता हूँ, कुर्बान हूँ। (हे मित्र!) तेरा नाम (मुझे) सबसे ज्यादा प्यारा (लगता) है, (इस नाम की इनायत से ही, दुनिया के कार्य वाली) तेरी दी हुई वेगार भी (मुझे) मीठी लगती है।1। रहाउ।
(हे सज्जन!) ना तू कहीं से आया, ना तू कभी कहीं गया और ना ही तू कहीं जा रहा है (भाव, तू सदा अटल है) द्वारिका नगरी में रास भी तू स्वयं ही डालता है (भाव, कृष्ण भी तू खुद ही है)।1।
हे यार! सुंदर सी तेरी पगड़ी है (भाव, तेरा स्वरूप सुंदर है) और प्यारे तेरे वचन हैं, ना तू सिर्फ द्वारिका में है और तू सिर्फ इस्लामी धर्म केन्द्र मक्के में है (बल्कि, तू हर जगह है)।2।
(सृष्टि के) कई हजार मण्डलों का तू इकलौता (खद ही) मालिक है। हे पातशाह! ऐसा ही साँवले रंग वाला कृष्ण है (भाव, कृष्ण भी तू स्वयं ही है)।3।
हे नामदेव के पति-प्रभु! तू स्वयं ही मीर है तू खुद ही कृष्ण है, तू स्वयं ही सूर्य देवता है, तू खुद ही इन्द्र है, और तू खुद ही ब्रहमा है।4।2।3।


बेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाइ ॥ टुकु दमु करारी जउ करहु हाजिर हजूरि खुदाइ ॥१॥

कतेब = पष्चिमी मतों की धार्मिक पुस्तक (तौरेत, ज़ंबूर, अंजील, कुरान)। इफतरा = (अरबी) मुबालग़ा, बनावट, अस्लियत से बढ़ा चढ़ा के बताई हुई बातें। फिकरु = सहम, अशांति। टुकु = थोड़ी सी। टुकु दमु = पलक भर। करारी = टिकाउ एकाग्रता। जउ = अगर। हाजिर हजूरि = हर जगह मौजूद। खुदाइ = रब, परमात्मा।1।

हे भाई! (वाद-विवाद की खातिर) वेदों-कतेबों के हवाले दे-दे कर ज्यादा बातें करने से (मनुष्य के अपने) दिल का सहम दूर नहीं होता। (हे भाई!) अगर तुम अपने मन को पलक भर के लिए ही टिकाओ, तो तुम्हें सब में ही बसता ईश्वर दिखेगा (किसी के विरुद्ध तर्क करने की आवश्यक्ता नहीं पड़ेगी)।1।


बंदे खोजु दिल हर रोज ना फिरु परेसानी माहि ॥ इह जु दुनीआ सिहरु मेला दसतगीरी नाहि ॥१॥ रहाउ॥

बंदे = हे मनुष्य! परेसानी = घबराहट। सिहरु = जादू, वह जिसकी अस्लियत कुछ और हो पर देखने को कुछ अजीब मन मोहना दिखता हो। मेला = खेल, तमाशा। दसतगीरी = (दसत = हाथ। गीरी = पकड़ना) हाथ पल्ले पड़ने वाली चीज, सदा संभाल के रखने वाली चीज। रहाउ।

हे भाई! (अपने ही) दिल को हर वक्त खोज, (बहस मुबाहसे की) घबराहट में ना भटक। ये जगत एक जादू सा है, एक तमाशे जैसा है, (इसमें से इस व्यर्थ के वाद-विवाद से) हाथ-पल्ले पड़ने वाली कोई चीज़ नहीं।1। रहाउ।


दरोगु पड़ि पड़ि खुसी होइ बेखबर बादु बकाहि ॥ हकु सचु खालकु खलक मिआने सिआम मूरति नाहि ॥२॥

दरोगु = झूठ। दरोगु पढ़ि पढ़ि = ये पढ़ के कि वेद झूठे हैं अथवा ये पढ़ के कि कतेब झूठे हैं। होइ = हो के। बेखबर = अन्जान मनुष्य। बादु = झगड़ा, बहस। बकाहि = बोलते हैं। बादु बकाहि = बहस करते हैं। हकु सचु = सदा कायम रहने वाला रब। मिआने = में। सिआम मूरति = श्याम मूर्ति, कृष्ण जी की मूर्ति। नाहि = (रब) नहीं है।2।

बेसमझ लोग (दूसरे मतों की धर्म-पुस्तकों के बारे में ये) पढ़-पढ़ के (कि इनमें जो लिखा है) झूठ (है), खुश हो-हो के बहस करते हैं। (पर, वे ये नहीं जानते कि) सदा कायम रहने वाला ईश्वर सृष्टि में (भी) बसता है, (ना वह अलग सातवें आसमान पर बैठा है और) ना ही वह परमात्मा कृष्ण की मूर्ति है।2।


असमान म्यिाने लहंग दरीआ गुसल करदन बूद ॥ करि फकरु दाइम लाइ चसमे जह तहा मउजूदु ॥३॥

असमान = आकाश, दसवाँ द्वार, अंतहकर्ण, मन। मिआने = मिआने, अंदर। लहंग = लांघता है, गुजरता है, बहता है। दरीआ = (सर्व व्यापक प्रभु-रूप) नदी। गुसल = स्नान। करदन बूद = (करदनी बूद) करना चाहिए था। फकरु = फकीरी, बंदगी वाला जीवन। चसमे = ऐनकें। जह तहा = हर जगह।3।

(सातवें आसमान में बैठा समझने की जगह, हे भाई!) वह प्रभु-रूप दरिया व अंतहकर्ण में लहरें मार रहा है, तूने उसमें स्नान करना था। सो, हमेशा उसकी बँदगी कर, (ये भक्ति की) ऐनक लगा (के देख), वह हर जगह मौजूद है।3।


अलाह पाकं पाक है सक करउ जे दूसर होइ ॥ कबीर करमु करीम का उहु करै जानै सोइ ॥४॥१॥

अलाह = अल्लाह। पाकं पाक = पवित्र से भी पवित्र, सबसे पवित्र। सक = शक, भ्रम। करउ = मैं करूँ। दूसर = (उस जैसा कोई और) दूसरा। करम = बख्शश। करीम = बख्शिश करने वाला। उहु = वह प्रभु। सोइ = वह मनुष्य (जिस पर प्रभु बख्शिश करता है)।4।

ईश्वर सब से पवित्र (हस्ती) है (उससे पवित्र और कोई नहीं है), इस बात पर मैं तब ही शक करूँ, अगर उस ईश्वर जैसा दूसरा और कोई हो। हे कबीर! (इस भेद को) वह मनुष्य ही समझ सकता है जिसको वह समझने के काबिल बनाए। और, ये बख्शिश उस बख्शिश करने वाले के अपने हाथ में है।4।1।


नामदेव जी ॥ मै अंधुले की टेक तेरा नामु खुंदकारा ॥ मै गरीब मै मसकीन तेरा नामु है अधारा ॥१॥ रहाउ॥

टेक = ओट, सहारा। खुंदकारा = सहारा। खुंदकार = बादशाह, हे मेरे पातशाह! मसकीन = आजिज़। अधारा = आसरा।1। रहाउ।

हे मेरे पातशाह! तेरा नाम मुझ अंधे की डंगोरी है, सहारा है; मैं कंगाल हूँ, मैं मसकीन हूँ, तेरा नाम (ही) मेरा आसरा है।1। रहाउ।


करीमां रहीमां अलाह तू गनीं ॥ हाजरा हजूरि दरि पेसि तूं मनीं ॥१॥

करीमां = हे करीम! हे बख्शिश करने वाले! रहीमां = हे रहीम! ळे रहम करने वाले! गनीं = अमीर, भरा पूरा। हाजरा हजूरि = हर जगह मौजूद, प्रत्यक्ष, मौजूद। दरि = में। पेसि = सामने। दरि पेसि मनीं = मेरे सामने।1।

हे अल्लाह! हे करीम! हे रहीम! तू (ही) अमीर है, तू हर वक्त मेरे सामने है (फिर, मुझे किसी और की क्या अधीनता?)।1।


दरीआउ तू दिहंद तू बिसीआर तू धनी ॥ देहि लेहि एकु तूं दिगर को नही ॥२॥

दिहंद = देने वाला, दाता। बिसीआर = बहुत। धनी = धनवाला। देहि = तू देता है। लेहि = तू लेता है। दिगर = कोई और, दूसरा।2।

तू (रहमत का) दरिया है, तू दाता है, तू बहुत ही धन वाला है; एक तू ही (जीवों को पदार्थ) देता है, और मोड़ लेता है, कोई और ऐसा नहीं (जो ये सामर्थ्य रखता हो)।2।


तूं दानां तूं बीनां मै बीचारु किआ करी ॥ नामे चे सुआमी बखसंद तूं हरी ॥३॥१॥२॥

दानां = जानने वाला। बीनां = देखने वाला। च = का। चे = के। ची = की। नामे चे = नामे के। नामे चे सुआमी = हे नामदेव के स्वामी!।3।

हे नामदेव के पति-परमेश्वर! हे हरि! तू सब बख्शिशें करने वाला है, तू (सबके दिल की) जानने वाला है और (सबके काम) देखने वाला है; हे हरि! मैं तेरे कौन-कौन से गुण बखान करूँ?।3।1।2।


हले यारां हले यारां खुसिखबरी ॥ बलि बलि जांउ हउ बलि बलि जांउ ॥ नीकी तेरी बिगारी आले तेरा नाउ ॥१॥ रहाउ॥

हले यारां = हे मित्र! हे सज्जन! खुसि = खुशी देने वाली, ठंड डालने वाली। खबरी = तेरी ख़बर, तेरी सोय (जैसे; “सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला”)। बलि बलि = सदके जाता हूँ। हउ = मैं। नीकी = सुंदर, अच्छी, प्यारी। बिगारी = वेगार, किसी और के लिए किया हुआ काम।
तेरी बिगारी = ये रोजी आदि कमाने का काम जिस में तूने हमें लगाया हुआ है। आले = आहला, ऊँचा, बड़ा, सब से प्यारा।1। रहाउ।

हे सज्जन! हे प्यारे! तेरी खबर ठंडक देने वाली है (भाव, तेरी कथा-कहानियाँ सुन के मुझे सकून मिलता है); मैं सदा तुझसे सदके जाता हूँ, कुर्बान हूँ। (हे मित्र!) तेरा नाम (मुझे) सबसे ज्यादा प्यारा (लगता) है, (इस नाम की इनायत से ही, दुनिया के कार्य वाली) तेरी दी हुई वेगार भी (मुझे) मीठी लगती है।1। रहाउ।


कुजा आमद कुजा रफती कुजा मे रवी ॥ द्वारिका नगरी रासि बुगोई ॥१॥

कुजा = (अज़) कुजा, कहाँ से? आमद = आमदी, तू आया। कुजा = कहाँ? रफती = तू गया था। मे रवी = तू जा रहा है। कुजा...मे रवी = तू कहाँ से आया? तू कहाँ गया? तू कहाँ जा रहा है? (भाव, ना तू कहीं से आया, ना तू कहीं कभी गया, और ना ही तू कहीं जा रहा है; तू सदा अटल है)। रासि = (संस्कृत: रास, a kind of dance practiced by Krishna and the cowherds but particularly the gopis or cowherdesses of Vrindavana, 2. Speech) रासें जहाँ कृष्ण जी नृत्य करते व गीत सुनाते थे। बुगोई = तू (ही) कहता है।1।

(हे सज्जन!) ना तू कहीं से आया, ना तू कभी कहीं गया और ना ही तू कहीं जा रहा है (भाव, तू सदा अटल है) द्वारिका नगरी में रास भी तू स्वयं ही डालता है (भाव, कृष्ण भी तू खुद ही है)।1।


खूबु तेरी पगरी मीठे तेरे बोल ॥ द्वारिका नगरी काहे के मगोल ॥२॥

खूब = सुंदर। द्वारिका नगरी....मगोल = काहे के द्वारका नगरी, काहे के मगोल; किस लिए द्वारका नगरी में और किसलिए मुगल (-धर्म) के नगर में? ना तू सिर्फ द्वारका में है, और ना तू सिर्फ मुसलमानी धर्म केन्द्र मक्के में है।2।

हे यार! सुंदर सी तेरी पगड़ी है (भाव, तेरा स्वरूप सुंदर है) और प्यारे तेरे वचन हैं, ना तू सिर्फ द्वारिका में है और तू सिर्फ इस्लामी धर्म केन्द्र मक्के में है (बल्कि, तू हर जगह है)।2।


चंदीं हजार आलम एकल खानां ॥ हम चिनी पातिसाह सांवले बरनां ॥३॥

चंदीं हजार = कई हजारों। आलम = दुनिया। एकल = अकेला। खानां = खान, मालिक। हम चिनी = इसी ही तरह का। हम = भी। चिनी = ऐसा। सांवले बरनां = साँवले रंग वाला, कृष्ण।3।

(सृष्टि के) कई हजार मण्डलों का तू इकलौता (खद ही) मालिक है। हे पातशाह! ऐसा ही साँवले रंग वाला कृष्ण है (भाव, कृष्ण भी तू स्वयं ही है)।3।


असपति गजपति नरह नरिंद ॥ नामे के स्वामी मीर मुकंद ॥४॥२॥३॥

असपति = (अश्वपति = Lord of horses) सूर्य देवता। गजपति = इन्द्र देवता। नरह मरिंद = नरों का राजा, ब्रहमा। मुकंद = (संस्कृत: मुकुंद = मुकुं दाति इति) मुक्ति देने वाला, विष्णु और कृष्ण जी का नाम है।4।

हे नामदेव के पति-प्रभु! तू स्वयं ही मीर है तू खुद ही कृष्ण है, तू स्वयं ही सूर्य देवता है, तू खुद ही इन्द्र है, और तू खुद ही ब्रहमा है।4।2।3।