Guruvaani - 642
मन कामना तीरथ जाइ बसिओ सिरि करवत धराए ॥ मन की मैलु न उतरै इह बिधि जे लख जतन कराए ॥३॥
कामना = इच्छा, फुरना। सिरि = सिर पर। करवत = आरा, शिव जी वाला आरा जो बानारस के शिव मंदिर में है। शिव लोक पहुँचने की चाहत वाले कई भटके हुए लोग अपने आप को इस आरे से चिरवा लेते हैं। इह बिधि = इस तरीके से।3।
हे भाई! कोई मनुष्य अपनी मनोकामना के अनुसार तीर्थों पे जा बसा है, (मुक्ति का चाहवान अपने) सिर पर (शिव जी वाला) आरा रखवाता है (और, अपने आप को चिरवा लेता है)। पर अगर कोई मनुष्य (ऐसे) लाखों ही प्रयत्न करे, इस तरह भी मन की (विकारों की) मैल नहीं उतरती।3।
कनिक कामिनी हैवर गैवर बहु बिधि दानु दातारा ॥ अंन बसत्र भूमि बहु अरपे नह मिलीऐ हरि दुआरा ॥४॥
कनिक = सोना। कामिनी = स्त्री। हैवर = (हयवर) बढ़िया घोड़े। गैवर = (गजवर) बढ़िया हाथी। दातारा = देने वाला। अरपे = दान करता। हरि दुआरा = हरि के दर पे।4।
हे भाई! कोई मनुष्य सोना, स्त्री, बढ़िया घोड़े, बढ़िया हाथी (और ऐसे ही) कई किसमों के दान करने वाला है। कोई मनुष्य अन्न दान करता है, कपड़े दान करता है, जमीन दान करता है। (इस तरह भी) परमात्मा के दर पर पहुँचा नहीं जा सकता।4।
पूजा अरचा बंदन डंडउत खटु करमा रतु रहता ॥ हउ हउ करत बंधन महि परिआ नह मिलीऐ इह जुगता ॥५॥
अरचा = मूर्ति पूजा। बंधन = नमस्कार। डंडउत = डंडे की तरह सीधे लंबे लेट के नमस्कार करनी। खटु = छह। खटु करमा = ब्राहमण के लिए छह जरूरी धार्मिक कर्म: विद्या पढ़नी और पढ़ानी, यज्ञ करना और करवाना, दान लेना और देना। रतु रहता = मगन रहता है। हउ हउ = मैं मैं। इह जुगता = इस तरीके से।5।
हे भाई! कोई मनुष्य देव-पूजा में, देवताओं को नमस्कार दंडवत करने में, खट् कर्म करने में मस्त रहता है। पर वह भी (इन निहित हुए धार्मिक कर्मों को करने के कारण अपने आप को धार्मिक समझ के) अहंकार करता-करता (माया के मोह के) बंधनो में जकड़ा रहता है। इस ढंग से भी परमात्मा को नहीं मिला जा सकता।5।
जोग सिध आसण चउरासीह ए भी करि करि रहिआ ॥ वडी आरजा फिरि फिरि जनमै हरि सिउ संगु न गहिआ ॥६॥
सिध = योगासनों में सिद्ध हुए योगी। रहिआ = थक गया। आरजा = उम्र। संगु = साथ। गहिआ = मिला।6।
जोग-मत में सिद्धों के प्रसिद्ध चौरासी आसन हैं। ये आसन कर करके भी मनुष्य थक जाता है। उम्र तो लंबी कर लेता है, पर इस तरह परमात्मा से मिलाप का संजोग नहीं बनता, बार बार जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहता है।6।
राज लीला राजन की रचना करिआ हुकमु अफारा ॥ सेज सोहनी चंदनु चोआ नरक घोर का दुआरा ॥७॥
लीला = रंग तमाशे। रचना = ठाठ बाठ। अफारा = जिसे कोई मोड़ न सके। चोआ = इत्र। घोर = भयानक।7।
हे भाई! कई ऐसे हैं जो राज हकूमत के रंग तमाशे भोगते हैं, राजाओं वाले ठाठ-बाठ बनाते हैं, लोगों पर हुक्म चलाते हैं, कोई उनका हुक्म मोड़ नहीं सकता। सुंदर स्त्री की सेज भोगते हैं, (अपने शरीर पर) चंदन व इत्र लगाते हैं। पर ये सब कुछ तो भयानक नर्क की ओर ले जाने वाले हैं।7।
हरि कीरति साधसंगति है सिरि करमन कै करमा ॥ कहु नानक तिसु भइओ परापति जिसु पुरब लिखे का लहना ॥८॥
कीरति = महिमा। करमन कै सिरि = सब (धार्मिक) कामों के सिर पर, सब कर्मों से श्रेष्ठ। पुरब लिखे का = पहले जन्म में किए कर्म के अनुसार।8।
हे भाई! साधु-संगत में बैठ के परमात्मा की महिमा करनी- ये कर्म और सारे कर्मों से श्रेष्ठ है। पर, हे नानक! कह: ये अवसर उस मनुष्य को ही मिलता है जिसके माथे पर पूर्बले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार लेख लिखा होता है।8।
तेरो सेवकु इह रंगि माता ॥ भइओ क्रिपालु दीन दुख भंजनु हरि हरि कीरतनि इहु मनु राता ॥ रहाउ दूजा ॥१॥३॥
रंगि = रंग में। माता = मस्त। कीरतनि = कीर्तन मे। राता = रंगा हुआ। रहाउ दूजा।
हे भाई! तेरा सेवक तेरी महिमा के रंग में मस्त रहता है। हे भाई! दीनों के दुख दूर करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य पर दयावान होता है, उसका ये मन परमात्मा की महिमा के रंग में रंगा रहता है। रहाउ दूजा।1।3।
रागु सोरठि वार महले ४ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः १ ॥ सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥ दंदी मैलु न कतु मनि जीभै सचा सोइ ॥ ससुरै पेईऐ भै वसी सतिगुरु सेवि निसंग ॥ परहरि कपड़ु जे पिर मिलै खुसी रावै पिरु संगि ॥ सदा सीगारी नाउ मनि कदे न मैलु पतंगु ॥ देवर जेठ मुए दुखि ससू का डरु किसु ॥ जे पिर भावै नानका करम मणी सभु सचु ॥१॥
मनि = मन में। दंदी मैलु = दातों में मैल, दंतकथा, निंदा। कतु = चीर, दूरी, वैर विरोध। ससुरै = ससुराल वाले घर, परलोक में। पेईऐ = पेके घर, इस लोक में। निसंग = बेझिझक। परहरि = छोड़ के। कपड़ु = दिखावा। पिर मिलै = पति को मिले। पिरु रावै = पति भोगता है, खुशी संग, प्रसन्नता से। पतंगु = रक्ती भा भी। ससू = माइआ। देवर जेठ = (सास) माया के पुत्र, कामादिक विकार। पिर भावै = पति को अच्छी लगे। करम मणी = भाग्यों की मणि।
सोरठि रागिनी हमेशा मधुर लगे अगर (इसके द्वारा प्रभु के गुण गाने से) सदा-स्थिर रहने वाला प्रभु मन में बस जाए, निंदा करने वाली आदत ना रहे, मन में किसी से वैर-विरोध ना हो, और जीभ पर सदा सच्चा मालिक हो। (इस तरह जीव-स्त्री) लोक-परलोक में (परमात्मा के) डर में जीवन गुजारती है और गुरु की सेवा करके बेझिझक हो जाती है (भाव, कोई सहम दबा नहीं पाता)। दिखावा छोड़ के अगर पति-प्रभु को मिल जाए तो पति भी प्रसन्न हो के इसको अपने साथ मिलाता है; जिस जीव-स्त्री के मन में प्रभु का नाम टिक जाए वह (इस नाम-श्रृंगार से) सदा सजी रहती है और कभी (विकारों की उसे) रक्ती भर मैल नहीं लगती। उस जीव-स्त्री के कामादिक विकार समाप्त हो जाते हैं, माया का भी कोई दबाव उस पर नहीं रह जाता।
हे नानक! (प्रभु पति को मन में बसा के) अगर जीव-स्त्री पति-प्रभु को अच्छी लगे तो उसके माथे के भाग्यों की टीका (समझें) उसे हर जगह सच्चा प्रभु ही (दिखता है)।1।
मः ४ ॥ सोरठि तामि सुहावणी जा हरि नामु ढंढोले ॥ गुर पुरखु मनावै आपणा गुरमती हरि हरि बोले ॥ हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥
तामि = तब। प्रेमि = प्रेम से। कसाई = कसी हुई, खिंची हुई। चोला = शरीर।
सोरठि रागिनी तभी सुंदर है, जब (इसके द्वारा जीव-स्त्री) हरि के नाम की खोज करे, अपने बड़े पति हरि को प्रसन्न करे और सतिगुरु की शिक्षा ले के प्रभु का स्मरण करे; दिन रात हरि के प्रेम में खिंची हुई अपने (शरीर रूपी) चोले को हरि के रंग में रंगे रखे।
हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥
मैंने सारा संसार तलाश के देख लिया है परमात्मा जैसा कोई पुरुष नहीं मिला।
गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥ जनु नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गोल गोले ॥२॥
अनत = किसी और तरफ़ से। गोल गोले = गोलों का गोला, दासों का दास।
गुरु सतिगुरु ने हरि का नाम (मेरे हृदय में) दृढ़ किया है, (इसलिए अब) मेरा मन कहीं डोलता नहीं, दास नानक प्रभु का दास है और गुरु सतिगुरु के दासों का दास है।
पउड़ी ॥ तू आपे सिसटि करता सिरजणहारिआ ॥ तुधु आपे खेलु रचाइ तुधु आपि सवारिआ ॥ दाता करता आपि आपि भोगणहारिआ ॥ सभु तेरा सबदु वरतै उपावणहारिआ ॥ हउ गुरमुखि सदा सलाही गुर कउ वारिआ ॥१॥
सबदु = हुक्म, जीवन लहर। गुरमुखि = गुरु के द्वारा।
हे विधाता! तू खुद ही संसार को रचने वाला है; (संसार रूप) खेल बना के तूने खुद ही इसे सुंदर बनाया है; संसार रचने वाला तू खुद ही है। इसे दातें बख्शने वाला भी तू स्वयं ही है, उन दातों को भोगने वाला भी तू खुद ही है; हे पैदा करने वाले! सब जगह तेरी जीवन लहर बरत रही है। (पर) मैं अपने सतिगुरु से सदके हूँ जिसके सन्मुख हो के तेरी महिमा सदा कर सकता हूँ।1।