Guruvaani - 566
ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु मेरै मनि भाइआ ॥ नामु मीठा मनहि लागा दूखि डेरा ढाहिआ ॥ सूखु मन महि आइ वसिआ जामि तै फुरमाइआ ॥ नदरि तुधु अरदासि मेरी जिंनि आपु उपाइआ ॥ ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥२॥
ता = तब ही। कहणु कहिआ = महिमा की। जा = जब। मनि = मन में। भाइआ = प्यारा लगा। मनहि = मन में। दूखि = दुख ने। जामि = जब। जिंनि = जिस (तू) ने। आपु = अपने आप को।2।
(पर, ये महिमा हे प्रभु! तेरी अपनी बख्शिश है) मैं तब ही महिमा कर सकता हूँ जब तू खुद प्रेरणा करता है।
(प्रभु की मेहर से ही) प्रभु का आत्मिक जीवन देने वाला नाम मेरे मन को प्यारा लग सकता है। जब प्रभु का नाम मन को मीठा लगता है तब दुखों ने (उस मन में से) अपना डेरा उठा लिया (समझो)।
हे प्रभु! जब तूने हुक्म किया तब आत्मिक आनंद मेरे मन में आ बसता है। हे प्रभु! जिस तू ने अपने आप को खुद ही (जगत-रूप में) प्रकट किया है, जब तू मुझे प्ररणा करता है तब ही मैं तेरी महिमा कर सकता हूँ। मेरी तो तेरे दर पे आरजू ही होती है, मेहर की नजर (तो) तू खुद ही करता है।2।
वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥ मंदा किसै न आखि झगड़ा पावणा ॥ नह पाइ झगड़ा सुआमि सेती आपि आपु वञावणा ॥ जिसु नालि संगति करि सरीकी जाइ किआ रूआवणा ॥ जो देइ सहणा मनहि कहणा आखि नाही वावणा ॥ वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥३॥
वारी = मानव जन्म की बारी। कढाए = देता है। किरतु कमावणा = की हुई मेहनत-कमाई के मुताबिक। सुआमि सेती = स्वामी से। वञावणा = वंजावणा, ख्वार करना, दुखी करना। रूआवणा = शिकायत करनी। देइ = देता है। मनहि = मना है, वर्जित। वावणा = गिला-शिकवा करना।3।
जीवों के किए कर्मों के अनुसार पति-प्रभु हरेक जीव को मानव जन्म की बारी देता है (पिछले कर्मों के संस्कारों के अनुसार ही किसी को अच्छा और किसी को बुरा बनाता है, इस वास्ते) किसी मनुष्य को बुरा कह कह के कोई झगड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए (बुरा मनुष्य प्रभु की रजा में ही बुरा बना हुआ है) बुरे की निंदा करना प्रभु से झगड़ा करना है। (सो, हे भाई!) मालिक प्रभु से झगड़ा नहीं डालना चाहिए, इस तरह तो (हम) अपने आप को खुद ही तबाह कर लेते हैं।
जिस मालिक के आसरे सदा जीना है, उसके साथ ही बराबरी करके (अगर दुख प्राप्त हुआ तो फिर उसके पास) जा के पुकार करने का कोई लाभ नहीं हो सकता। परमात्मा जो (सुख-दुख) देता है वह (खिले माथे) सहना चाहिए, गिला-श्किवा नहीं करना चाहिए, गिला-गुजारी करके व्यर्थ बोल-कुबोल नहीं बोलने चाहिए। (दरअसल बात ये है कि) हमारे किए कर्मों के अनुसार पति-प्रभु हमें मानव जनम की बारी देता है।3।
सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥ कउड़ा कोइ न मागै मीठा सभ मागै ॥ सभु कोइ मीठा मंगि देखै खसम भावै सो करे ॥ किछु पुंन दान अनेक करणी नाम तुलि न समसरे ॥ नानका जिन नामु मिलिआ करमु होआ धुरि कदे ॥ सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥४॥१॥
उपाईअनु = उसने पैदा की है। सभु कोइ = हरेक जीव। तुलि = बराबर। समसरे = बराबर। करमु = कृपा। धुरि = धुर से। कदे = कब की।4।
सारी सृष्टि परमात्मा ने स्वयं पैदा की है, खुद ही हरेक जीव पर मेहर की निगाह करता है। (उसके दर से सब जीव दातें मांगते हैं) कड़वी चीज (कोई भी) नहीं मांगता, हरेक जीव मीठी सुखदाई वस्तुएं ही मांगता है। हरेक जीव मीठे पदार्थों की मांग ही करता है, पर पति-प्रभु वही कुछ करता है (देता है) जो उसे अच्छा लगता है।
जीव (दुनिया के मीठे पदार्थों की खातिर) दान-पुण्य करते हैं, ऐसे और भी धार्मिक कर्म करते हैं, पर परमात्मा के नाम के बराबर और कोई उद्यम नहीं है। हे नानक! जिस लोगों पर धुर से परमात्मा की ओर से बख्शिश होती है उन्हें नाम की दाति मिलती है।
ये सारा जगत प्रभु ने खुद पैदा किया है और खुद ही सब पर मेहर की नजर करता है।4।1।
वडहंसु महला १ ॥ करहु दइआ तेरा नामु वखाणा ॥ सभ उपाईऐ आपि आपे सरब समाणा ॥ सरबे समाणा आपि तूहै उपाइ धंधै लाईआ ॥ इकि तुझ ही कीए राजे इकना भिख भवाईआ ॥ लोभु मोहु तुझु कीआ मीठा एतु भरमि भुलाणा ॥ सदा दइआ करहु अपणी तामि नामु वखाणा ॥१॥
वखाणा = मैं उच्चारूँ। उपाईऐ = पैदा की है। सरब = सभी में। उपाइ = पैदा करके। धंधै = रोजी रोटी में, माया की दौड़ भाग में। इकि = कई। एतु भरमि = इस भ्रम में, इस भटकना में। तामि = तब ही।1।
हे प्रभु! मेहर कर कि मैं तेरा नाम स्मरण कर सकूँ। तूने सारी सृष्टि खुद ही पैदा की है और खुद ही सब जीवों में व्यापक है। तू खुद ही सब जीवों में समाया हुआ है, पैदा करके तूने खुद ही सुष्टि को माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है।
कई जीवों को तू स्वयं ही राजे बना देता है, और कई जीवों को (भिखारी बना के) भिक्षा मांगने के वास्ते (दर-ब-दर) भटका रहा है।
हे प्रभु! तूने लोभ और मोह को मीठा बना दिया है, जगत इस भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर चल रहा है। अगर तू सदा अपनी मेहर करता रहे तो ही मैं तेरा नाम स्मरण कर सकता हूँ।1।
नामु तेरा है साचा सदा मै मनि भाणा ॥ दूखु गइआ सुखु आइ समाणा ॥ गावनि सुरि नर सुघड़ सुजाणा ॥ सुरि नर सुघड़ सुजाण गावहि जो तेरै मनि भावहे ॥ माइआ मोहे चेतहि नाही अहिला जनमु गवावहे ॥ इकि मूड़ मुगध न चेतहि मूले जो आइआ तिसु जाणा ॥ नामु तेरा सदा साचा सोइ मै मनि भाणा ॥२॥
साचा = सदा स्थिर रहने वाला। मै मनि = मेरे मन में। भाणा = प्यारा लगता है। सुरि नर = श्रेष्ठ मनुष्य। सुघड़ = सुचजे। सुजाण = सुजान, माहिर। भावहे = भाते हैं। अहिला = उत्तम, श्रेष्ठ। मूढ़ मुगध = मूर्ख। मूले = बिल्कुल ही। सोइ = वही।2।
हे प्रभु! तेरा नाम सदा स्थिर रहने वाला है, तेरा नाम मेरे मन को प्यारा लगता है। जो मनुष्य तेरा नाम स्मरण करता है उसका दुख दूर हो जाता है और आत्मिक आनंद उसके अंदर आ बसता है।
भाग्यशाली सदाचारी समझदार मनुष्य तेरी महिमा के गीत गाते हैं। हे प्रभु! जो बंदे तेरे मन को भाते हैं वे सुघड़ सुजान तेरी महिमा के गीत गाते हैं। पर, जो मनुष्य माया में मोहे जाते हैं वे तुझे नहीं स्मरण करते वे अपना अमूल्य जन्म गवा लेते हैं।
अनेक ऐसे मूर्ख मनुष्य हैं जो, हे प्रभु! तुझे याद नहीं करते (वे ये नहीं समझते कि) जो जगत में पैदा हुआ है उसने (आखिर यहाँ से) चले जाना है। हे प्रभु! तेरा सदा ही स्थिर रहने वाला है, तेरा नाम मेरे मन को प्यारा लग रहा है।2।
तेरा वखतु सुहावा अम्रितु तेरी बाणी ॥ सेवक सेवहि भाउ करि लागा साउ पराणी ॥ साउ प्राणी तिना लागा जिनी अम्रितु पाइआ ॥ नामि तेरै जोइ राते नित चड़हि सवाइआ ॥ इकु करमु धरमु न होइ संजमु जामि न एकु पछाणी ॥ वखतु सुहावा सदा तेरा अम्रित तेरी बाणी ॥३॥
वखतु = समय। तेरा वखतु = वह समय जब तू याद आए। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली। भाउ = प्रेम। साउ = स्वाद, आनंद। नामि = नाम में। जोइ = जो लोग। चढ़हि सवाइआ = बढ़ते फूलते हैं। जामि = जब। न पछाणी = मैं नहीं पहचानता।3।
हे प्रभु! तेरी महिमा की वाणी अमृत है (अटल आत्मिक जीवन देने वाली है) वह वक्त बहुत सुहावना लगता है जब तेरा नाम याद करते हैं। जिस बंदों को तेरे नाम का रस आता है वह सेवक प्रेम से तेरा नाम स्मरण करते हैं। उन ही लोगों को नाम का रस आता है जिनको ये नाम अमृत प्राप्त होता है। हे प्रभु! जो लोग तेरे नाम में जुड़ते हैं वह (आत्मिक जीवन की उन्नति में) सदा बढ़ते-फूलते रहते हैं।
हे प्रभु! जब तक मैं तेरे साथ एक गहरी सांझ नहीं डालता तब तक और कोई एक भी धर्म-कर्म कोई एक भी संयम किसी अर्थ के नहीं। तेरी महिमा की वाणी आत्मिक जीवन-दाती है, वह वक्त बहुत सुहाना लगता है जब तेरा नाम स्मरण करते हैं।3।