Guruvaani - 525

गूजरी स्री नामदेव जी के पदे घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

जौ = यदि। भीख मंगावहि = मुझसे भीख मंगाए, मुझे भिखारी बना दे, मुझे कंगाल कर दे।1।
पदु = दर्जा, मुकाम। निरबानु = निरवाण, वासना रहित, जहाँ दुनिया की कोई वासना ना रहे। बहुरि = फिर, दुबारा।1। रहाउ।
तै = (हे प्रभु!) तू। उपाई = पैदा की। बुझाई = समझ दी, सूझ।2।
सहसा = दिल की घबराहट। जाई = दूर हो जाती है।3।
भाउ = प्यार। पाउ = पैर। देउ = देवता।4।
मलै = मल का, मैल का। लाछै = लांछन, दाग, निशान। पारमलो = पार मल, मल रहित। परमलिओ = (संस्कृत: परिमल) सुगंधि। री = हे बहन! कवनै = कौन? री बाई = हे बहन!।1।
कहै = बयान कर सकता है। किणि = किस ने? रमईआ = सोहाना राम। आकुलु = (संस्कृत: अ: समन्नात् कुलं यस्य; जिसकी कुल चार चुफेरे है) जो हर जगह मौजूद है, सर्व व्यापक।1। रहाउ।
निरखिओ न जाई = देखा नहीं जा सकता। माझै = में। मारगु = रास्ता।2।
आकासै = आकाश में (सं: आकाश, Free Space, place in general) खुली जगह, मैदान में। घड़ूअलो = पानी का घड़ा (भाव, पानी)। म्रिग त्रिसना = मृगतृष्णा, वह पानी जो प्यासे हिरन को रेतीली जगह पर प्रतीत होता है (म्रिग = मृग, हिरन। त्रिसना = प्यास)। म्रिग त्रिसना घड़ूअलो = प्यासे हिरन का पानी, मृग तृष्णा का जल। चे = दे। बीठलो = (सं: वि+स्थल, परे खड़ा हुआ) माया से निराला, निर्लिप प्रभु। जिनि = जिस (बीठल) ने। तीनै = तीनों ताप। जरिआ = जला दिए हैं।3।
बछरै = बछरे ने। थनहु = थनों से (ही)। बिटारिओ = जूठा कर दिया। भवरि = भवर ने। मीनि = मीन ने, मछली ने।1।
माई = हे माँ! कहा = कहाँ? लै = ले कर। चरावउ = मैं भेट करूँ। अनूपु = (अन+ऊपु) जिस जैसा और कोई नहीं, सुंदर। न पावउ = मैं हासिल नहीं कर सकूँगा।1। रहाउ।
मैलागर = (मलय+अगर) मलय पर्वत पर उगे हुए चंदन के पौधे। बेर्हे = लपेटे हुए। भुइअंगा = साँप। बिखु = जहर। इक संगा = इकट्ठे।2।
दीप = दीया। नइबेद = (संस्कृत: नैवेद्य An offering of eatables presented to deity or idol) किसी बुत या देवी देवते के आगे खाने वाली चीजों की भेटें। बासा = वासना, सुगंधि।3।
अरपउ = मैं अरप दूँ, मैं भेटा कर दूँ। चरावउ = चढ़ाऊँ, भेटा।4।
अरचा = मूर्ति आदि की पूजा, मूर्ति आदि के आगे सिर झुकाना, मूर्ति को श्रृंगारना। आहि न = नहीं हो सकी। कहि = कहै, कहता है। कवन गति = क्या हाल?।5।
अंतरु = अंदरूनी (मन) (शब्द ‘अंतरु’ और ‘अंतरि’ का फर्क समझने के लिए देखें ‘गुरबाणी व्याकरण’)। मलि = मल वाला, मलीन।
कीना = किया। भेख = धार्मिक लिबास। उदासी = विरक्त, जगत की ओर से उपराम। हिरदै कमलु न चीना = हृदय का कमल पुष्प नहीं पहचाना। घटि = घट में, हृदय में।1।

(हे मन! एक प्रभु के दर पर यूँ कह: हे प्रभु!) अगर तू मुझे राज (भी) दे दे, तो किसी तरह बड़ा नहीं हो जाऊँगा और अगर तू मुझे कंगाल कर दे, तो मेरा कुछ घट नहीं जाना।1।
(सुख मांगने के लिए और दुखों से बचने के लिए, अंजान लोग अपने ही हाथों पत्थरों से घड़े हुए देवताओं के आगे नाक रगड़ते हैं; पर) हे मेरे मन! तू एक प्रभु को स्मरण कर; वही वासना-रहित अवस्था (देने वाला) है, (उसका स्मरण करने से) फिर तेरा (जगत में) जगत में पैदा होना-मरना मिट जाएगा।1। रहाउ।
(हे प्रभु!) सारी सृष्टि तूने स्वयं ही पैदा की है और भरमों में गलत रास्ते पर डाली हुई है, जिस जीव को तू खुद मति देता है उसे ही सद्-बुद्धि आती है।2।
(जिस भाग्यशालियों को) सतिगुरु मिल जाए (दुखों-सुखों के बारे में) उसके दिल की घबराहट दूर हो जाती है (और वह अपने ही घड़े हुए देवताओं के आगे नाक नहीं रगड़ता फिरता)। (मुझे गुरु ने समझ बख्शी है) प्रभु के बिना कोई और (दुख-सुख देने वाला) मुझे नहीं दिखता, (इस वास्ते) मैं किसी और की पूजा नहीं करता।3।
(क्या अजीब बात है कि) एक पत्थर (को देवता बना के उसके) साथ प्यार किया जाता है और दूसरों पत्थरों पर पैर रखा जाता है। अगर वह पत्थर (जिसकी पूजा की जाती है) देवता है तो दूसरा पत्थर भी देवता है (उसे क्यूँ पैरों के तले लिताड़ते हैं? पर) नामदेव कहता है (हम किसी पत्थर को देवता स्थापित करके उसकी पूजा करने के लिए तैयार नहीं), हम तो परमात्मा की बंदगी करते हैं।4।1।
हे बहन! उस सुंदर राम को मैल का दाग़ तक नहीं है, वह मैल से परे है, वह राम तो सुगंधि (की तरह) सब जीवों में आ के बसता है, (भाव, जैसे सुगंधि फूलों में है)। हे बहन! उस सोहने राम को कभी किसी ने पैदा होता नहीं देखा, कोई नहीं जानता कि वह कैसा है।1।
हे बहन! मेरा सुंदर राम हर जगह व्यापक है, पर कोई जीव भी (उसका मुकम्मल स्वरूप) बयान नहीं कर सकता, किसी ने भी (उसके मुकम्मल स्वरूप को) नहीं समझा।1। रहाउ।
जैसे आकाश में पंछी उड़ता है, पर उसके उड़ने वाले रास्ते का खुरा-खोज देखा नहीं जा सकता, जैसे मछली पानी में तैरती है पर जिस रास्ते पर तैरती है वह राह देखी नहीं जा सकती (भाव, आँखों के आगे कायम नहीं किया जा सकता, वैसे ही उस प्रभु का मुकम्मल स्वरूप बयान नहीं हो सकता)।2।
जैसे खुली जगह मृग तृष्णा को जल दिखता है (आगे आगे बढ़ते जाएं पर उसका ठिकाना नहीं मिलता,इसी तरह प्रभु का खास ठिकाना नहीं मिलता। वैसे ही) नामदेव के पति बीठल जी ऐसे हैं जिसने मेरे तीनों ताप जला डाले हैं।3।2।
दूध तो थनों से ही बछड़े ने झूठा कर दिया; फूल भौरे ने (सूँघ के) और पानी को मछली ने खराब कर दिया (सो, दूध, फूल और पानी ये तीनों ही झूठे हो जाने के कारण प्रभु के आगे भेटा के योग्य नहीं रह गए)।1।
हे माँ! गोबिंद की पूजा करने के लिए मैं कहाँ से कौन सी चीज ले के भेट करूँ? कोई और (स्वच्छ) फूल (आदि मिल) नहीं (सकता)। क्या मैं (इस कमी के कारण) उस सोहाने प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकूँगा।?।1। रहाउ।
चंदन के पौधों को साँप चिपके हुए हैं (और उन्होंने चंदन को झूठा कर दिया है), जहर और अमृत (भी समुंदर में) इकट्ठे ही बसते हैं।2।
सुगंधि आ जाने के कारण धूप दीप और नैवेद्य भी (झूठे हो जाते हैं), (फिर हे प्रभु! अगर तेरी पूजा इन चीजों के साथ ही हो सकती हो, तो यह झूठी चीजें तेरे आगे रख के) तेरे भक्त किस तरह तेरी पूजा करें?।3।
(हे प्रभु!) मैं अपना तन और मन अर्पित करता हूँ, तेरी पूजा के तौर पर भेट करता हूँ; (इसी भेटा से ही) सतिगुरु की मेहर की इनायत से तुझ माया-रहित को ढूँढ सकता हूँ।4।
रविदास कहता है: (हे प्रभु! अगर सुच्चे दूध, फूल, धूप, चंदन और नैवेद आदि की भेटा से ही तेरी पूजा हो सकती तो कहीं भी ये वस्तुएं स्वच्छ ना मिलने के कारण) मुझसे तेरी पूजा व भक्ति हो ही नहीं सकती, तो फिर (हे प्रभु!) मेरा क्या हाल होता?।5।1।
अगर (किसी मनुष्य ने) अंदरूनी मलीन (मन) साफ नहीं किया, पर बाहर से (शरीर पर) साधूओं वाला भेस बनाया हुआ है, अगर उसने अपने हृदय रूपी कमल को नहीं परखा, अगर उसने अपने अंदर परमात्मा को नहीं देखा, तो सन्यास धारण करने का कोई लाभ नहीं।1।


जौ राजु देहि त कवन बडाई ॥ जौ भीख मंगावहि त किआ घटि जाई ॥१॥

जौ = यदि। भीख मंगावहि = मुझसे भीख मंगाए, मुझे भिखारी बना दे, मुझे कंगाल कर दे।1।

(हे मन! एक प्रभु के दर पर यूँ कह: हे प्रभु!) अगर तू मुझे राज (भी) दे दे, तो किसी तरह बड़ा नहीं हो जाऊँगा और अगर तू मुझे कंगाल कर दे, तो मेरा कुछ घट नहीं जाना।1।


तूं हरि भजु मन मेरे पदु निरबानु ॥ बहुरि न होइ तेरा आवन जानु ॥१॥ रहाउ॥

पदु = दर्जा, मुकाम। निरबानु = निरवाण, वासना रहित, जहाँ दुनिया की कोई वासना ना रहे। बहुरि = फिर, दुबारा।1। रहाउ।

(सुख मांगने के लिए और दुखों से बचने के लिए, अंजान लोग अपने ही हाथों पत्थरों से घड़े हुए देवताओं के आगे नाक रगड़ते हैं; पर) हे मेरे मन! तू एक प्रभु को स्मरण कर; वही वासना-रहित अवस्था (देने वाला) है, (उसका स्मरण करने से) फिर तेरा (जगत में) जगत में पैदा होना-मरना मिट जाएगा।1। रहाउ।


सभ तै उपाई भरम भुलाई ॥ जिस तूं देवहि तिसहि बुझाई ॥२॥

तै = (हे प्रभु!) तू। उपाई = पैदा की। बुझाई = समझ दी, सूझ।2।

(हे प्रभु!) सारी सृष्टि तूने स्वयं ही पैदा की है और भरमों में गलत रास्ते पर डाली हुई है, जिस जीव को तू खुद मति देता है उसे ही सद्-बुद्धि आती है।2।


सतिगुरु मिलै त सहसा जाई ॥ किसु हउ पूजउ दूजा नदरि न आई ॥३॥

सहसा = दिल की घबराहट। जाई = दूर हो जाती है।3।

(जिस भाग्यशालियों को) सतिगुरु मिल जाए (दुखों-सुखों के बारे में) उसके दिल की घबराहट दूर हो जाती है (और वह अपने ही घड़े हुए देवताओं के आगे नाक नहीं रगड़ता फिरता)। (मुझे गुरु ने समझ बख्शी है) प्रभु के बिना कोई और (दुख-सुख देने वाला) मुझे नहीं दिखता, (इस वास्ते) मैं किसी और की पूजा नहीं करता।3।


एकै पाथर कीजै भाउ ॥ दूजै पाथर धरीऐ पाउ ॥ जे ओहु देउ त ओहु भी देवा ॥ कहि नामदेउ हम हरि की सेवा ॥४॥१॥

भाउ = प्यार। पाउ = पैर। देउ = देवता।4।

(क्या अजीब बात है कि) एक पत्थर (को देवता बना के उसके) साथ प्यार किया जाता है और दूसरों पत्थरों पर पैर रखा जाता है। अगर वह पत्थर (जिसकी पूजा की जाती है) देवता है तो दूसरा पत्थर भी देवता है (उसे क्यूँ पैरों के तले लिताड़ते हैं? पर) नामदेव कहता है (हम किसी पत्थर को देवता स्थापित करके उसकी पूजा करने के लिए तैयार नहीं), हम तो परमात्मा की बंदगी करते हैं।4।1।


गूजरी घरु १ ॥ मलै न लाछै पार मलो परमलीओ बैठो री आई ॥ आवत किनै न पेखिओ कवनै जाणै री बाई ॥१॥

मलै = मल का, मैल का। लाछै = लांछन, दाग, निशान। पारमलो = पार मल, मल रहित। परमलिओ = (संस्कृत: परिमल) सुगंधि। री = हे बहन! कवनै = कौन? री बाई = हे बहन!।1।

हे बहन! उस सुंदर राम को मैल का दाग़ तक नहीं है, वह मैल से परे है, वह राम तो सुगंधि (की तरह) सब जीवों में आ के बसता है, (भाव, जैसे सुगंधि फूलों में है)। हे बहन! उस सोहने राम को कभी किसी ने पैदा होता नहीं देखा, कोई नहीं जानता कि वह कैसा है।1।


कउणु कहै किणि बूझीऐ रमईआ आकुलु री बाई ॥१॥ रहाउ॥

कहै = बयान कर सकता है। किणि = किस ने? रमईआ = सोहाना राम। आकुलु = (संस्कृत: अ: समन्नात् कुलं यस्य; जिसकी कुल चार चुफेरे है) जो हर जगह मौजूद है, सर्व व्यापक।1। रहाउ।

हे बहन! मेरा सुंदर राम हर जगह व्यापक है, पर कोई जीव भी (उसका मुकम्मल स्वरूप) बयान नहीं कर सकता, किसी ने भी (उसके मुकम्मल स्वरूप को) नहीं समझा।1। रहाउ।


जिउ आकासै पंखीअलो खोजु निरखिओ न जाई ॥ जिउ जल माझै माछलो मारगु पेखणो न जाई ॥२॥

निरखिओ न जाई = देखा नहीं जा सकता। माझै = में। मारगु = रास्ता।2।

जैसे आकाश में पंछी उड़ता है, पर उसके उड़ने वाले रास्ते का खुरा-खोज देखा नहीं जा सकता, जैसे मछली पानी में तैरती है पर जिस रास्ते पर तैरती है वह राह देखी नहीं जा सकती (भाव, आँखों के आगे कायम नहीं किया जा सकता, वैसे ही उस प्रभु का मुकम्मल स्वरूप बयान नहीं हो सकता)।2।


जिउ आकासै घड़ूअलो म्रिग त्रिसना भरिआ ॥ नामे चे सुआमी बीठलो जिनि तीनै जरिआ ॥३॥२॥

आकासै = आकाश में (सं: आकाश, Free Space, place in general) खुली जगह, मैदान में। घड़ूअलो = पानी का घड़ा (भाव, पानी)। म्रिग त्रिसना = मृगतृष्णा, वह पानी जो प्यासे हिरन को रेतीली जगह पर प्रतीत होता है (म्रिग = मृग, हिरन। त्रिसना = प्यास)। म्रिग त्रिसना घड़ूअलो = प्यासे हिरन का पानी, मृग तृष्णा का जल। चे = दे। बीठलो = (सं: वि+स्थल, परे खड़ा हुआ) माया से निराला, निर्लिप प्रभु। जिनि = जिस (बीठल) ने। तीनै = तीनों ताप। जरिआ = जला दिए हैं।3।

जैसे खुली जगह मृग तृष्णा को जल दिखता है (आगे आगे बढ़ते जाएं पर उसका ठिकाना नहीं मिलता,इसी तरह प्रभु का खास ठिकाना नहीं मिलता। वैसे ही) नामदेव के पति बीठल जी ऐसे हैं जिसने मेरे तीनों ताप जला डाले हैं।3।2।


गूजरी स्री रविदास जी के पदे घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

बछरै = बछरे ने। थनहु = थनों से (ही)। बिटारिओ = जूठा कर दिया। भवरि = भवर ने। मीनि = मीन ने, मछली ने।1।
माई = हे माँ! कहा = कहाँ? लै = ले कर। चरावउ = मैं भेट करूँ। अनूपु = (अन+ऊपु) जिस जैसा और कोई नहीं, सुंदर। न पावउ = मैं हासिल नहीं कर सकूँगा।1। रहाउ।
मैलागर = (मलय+अगर) मलय पर्वत पर उगे हुए चंदन के पौधे। बेर्हे = लपेटे हुए। भुइअंगा = साँप। बिखु = जहर। इक संगा = इकट्ठे।2।
दीप = दीया। नइबेद = (संस्कृत: नैवेद्य An offering of eatables presented to deity or idol) किसी बुत या देवी देवते के आगे खाने वाली चीजों की भेटें। बासा = वासना, सुगंधि।3।
अरपउ = मैं अरप दूँ, मैं भेटा कर दूँ। चरावउ = चढ़ाऊँ, भेटा।4।
अरचा = मूर्ति आदि की पूजा, मूर्ति आदि के आगे सिर झुकाना, मूर्ति को श्रृंगारना। आहि न = नहीं हो सकी। कहि = कहै, कहता है। कवन गति = क्या हाल?।5।
अंतरु = अंदरूनी (मन) (शब्द ‘अंतरु’ और ‘अंतरि’ का फर्क समझने के लिए देखें ‘गुरबाणी व्याकरण’)। मलि = मल वाला, मलीन।
कीना = किया। भेख = धार्मिक लिबास। उदासी = विरक्त, जगत की ओर से उपराम। हिरदै कमलु न चीना = हृदय का कमल पुष्प नहीं पहचाना। घटि = घट में, हृदय में।1।

दूध तो थनों से ही बछड़े ने झूठा कर दिया; फूल भौरे ने (सूँघ के) और पानी को मछली ने खराब कर दिया (सो, दूध, फूल और पानी ये तीनों ही झूठे हो जाने के कारण प्रभु के आगे भेटा के योग्य नहीं रह गए)।1।
हे माँ! गोबिंद की पूजा करने के लिए मैं कहाँ से कौन सी चीज ले के भेट करूँ? कोई और (स्वच्छ) फूल (आदि मिल) नहीं (सकता)। क्या मैं (इस कमी के कारण) उस सोहाने प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकूँगा।?।1। रहाउ।
चंदन के पौधों को साँप चिपके हुए हैं (और उन्होंने चंदन को झूठा कर दिया है), जहर और अमृत (भी समुंदर में) इकट्ठे ही बसते हैं।2।
सुगंधि आ जाने के कारण धूप दीप और नैवेद्य भी (झूठे हो जाते हैं), (फिर हे प्रभु! अगर तेरी पूजा इन चीजों के साथ ही हो सकती हो, तो यह झूठी चीजें तेरे आगे रख के) तेरे भक्त किस तरह तेरी पूजा करें?।3।
(हे प्रभु!) मैं अपना तन और मन अर्पित करता हूँ, तेरी पूजा के तौर पर भेट करता हूँ; (इसी भेटा से ही) सतिगुरु की मेहर की इनायत से तुझ माया-रहित को ढूँढ सकता हूँ।4।
रविदास कहता है: (हे प्रभु! अगर सुच्चे दूध, फूल, धूप, चंदन और नैवेद आदि की भेटा से ही तेरी पूजा हो सकती तो कहीं भी ये वस्तुएं स्वच्छ ना मिलने के कारण) मुझसे तेरी पूजा व भक्ति हो ही नहीं सकती, तो फिर (हे प्रभु!) मेरा क्या हाल होता?।5।1।
अगर (किसी मनुष्य ने) अंदरूनी मलीन (मन) साफ नहीं किया, पर बाहर से (शरीर पर) साधूओं वाला भेस बनाया हुआ है, अगर उसने अपने हृदय रूपी कमल को नहीं परखा, अगर उसने अपने अंदर परमात्मा को नहीं देखा, तो सन्यास धारण करने का कोई लाभ नहीं।1।


दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ ॥ फूलु भवरि जलु मीनि बिगारिओ ॥१॥

बछरै = बछरे ने। थनहु = थनों से (ही)। बिटारिओ = जूठा कर दिया। भवरि = भवर ने। मीनि = मीन ने, मछली ने।1।

दूध तो थनों से ही बछड़े ने झूठा कर दिया; फूल भौरे ने (सूँघ के) और पानी को मछली ने खराब कर दिया (सो, दूध, फूल और पानी ये तीनों ही झूठे हो जाने के कारण प्रभु के आगे भेटा के योग्य नहीं रह गए)।1।


माई गोबिंद पूजा कहा लै चरावउ ॥ अवरु न फूलु अनूपु न पावउ ॥१॥ रहाउ॥

माई = हे माँ! कहा = कहाँ? लै = ले कर। चरावउ = मैं भेट करूँ। अनूपु = (अन+ऊपु) जिस जैसा और कोई नहीं, सुंदर। न पावउ = मैं हासिल नहीं कर सकूँगा।1। रहाउ।

हे माँ! गोबिंद की पूजा करने के लिए मैं कहाँ से कौन सी चीज ले के भेट करूँ? कोई और (स्वच्छ) फूल (आदि मिल) नहीं (सकता)। क्या मैं (इस कमी के कारण) उस सोहाने प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकूँगा।?।1। रहाउ।


मैलागर बेर्हे है भुइअंगा ॥ बिखु अम्रितु बसहि इक संगा ॥२॥

मैलागर = (मलय+अगर) मलय पर्वत पर उगे हुए चंदन के पौधे। बेर्हे = लपेटे हुए। भुइअंगा = साँप। बिखु = जहर। इक संगा = इकट्ठे।2।

चंदन के पौधों को साँप चिपके हुए हैं (और उन्होंने चंदन को झूठा कर दिया है), जहर और अमृत (भी समुंदर में) इकट्ठे ही बसते हैं।2।


धूप दीप नईबेदहि बासा ॥ कैसे पूज करहि तेरी दासा ॥३॥

दीप = दीया। नइबेद = (संस्कृत: नैवेद्य An offering of eatables presented to deity or idol) किसी बुत या देवी देवते के आगे खाने वाली चीजों की भेटें। बासा = वासना, सुगंधि।3।

सुगंधि आ जाने के कारण धूप दीप और नैवेद्य भी (झूठे हो जाते हैं), (फिर हे प्रभु! अगर तेरी पूजा इन चीजों के साथ ही हो सकती हो, तो यह झूठी चीजें तेरे आगे रख के) तेरे भक्त किस तरह तेरी पूजा करें?।3।


तनु मनु अरपउ पूज चरावउ ॥ गुर परसादि निरंजनु पावउ ॥४॥

अरपउ = मैं अरप दूँ, मैं भेटा कर दूँ। चरावउ = चढ़ाऊँ, भेटा।4।

(हे प्रभु!) मैं अपना तन और मन अर्पित करता हूँ, तेरी पूजा के तौर पर भेट करता हूँ; (इसी भेटा से ही) सतिगुरु की मेहर की इनायत से तुझ माया-रहित को ढूँढ सकता हूँ।4।


पूजा अरचा आहि न तोरी ॥ कहि रविदास कवन गति मोरी ॥५॥१॥

अरचा = मूर्ति आदि की पूजा, मूर्ति आदि के आगे सिर झुकाना, मूर्ति को श्रृंगारना। आहि न = नहीं हो सकी। कहि = कहै, कहता है। कवन गति = क्या हाल?।5।

रविदास कहता है: (हे प्रभु! अगर सुच्चे दूध, फूल, धूप, चंदन और नैवेद आदि की भेटा से ही तेरी पूजा हो सकती तो कहीं भी ये वस्तुएं स्वच्छ ना मिलने के कारण) मुझसे तेरी पूजा व भक्ति हो ही नहीं सकती, तो फिर (हे प्रभु!) मेरा क्या हाल होता?।5।1।


गूजरी स्री त्रिलोचन जीउ के पदे घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

अंतरु = अंदरूनी (मन) (शब्द ‘अंतरु’ और ‘अंतरि’ का फर्क समझने के लिए देखें ‘गुरबाणी व्याकरण’)। मलि = मल वाला, मलीन।
कीना = किया। भेख = धार्मिक लिबास। उदासी = विरक्त, जगत की ओर से उपराम। हिरदै कमलु न चीना = हृदय का कमल पुष्प नहीं पहचाना। घटि = घट में, हृदय में।1।

अगर (किसी मनुष्य ने) अंदरूनी मलीन (मन) साफ नहीं किया, पर बाहर से (शरीर पर) साधूओं वाला भेस बनाया हुआ है, अगर उसने अपने हृदय रूपी कमल को नहीं परखा, अगर उसने अपने अंदर परमात्मा को नहीं देखा, तो सन्यास धारण करने का कोई लाभ नहीं।1।


अंतरु मलि निरमलु नही कीना बाहरि भेख उदासी ॥ हिरदै कमलु घटि ब्रहमु न चीन्हा काहे भइआ संनिआसी ॥१॥

अंतरु = अंदरूनी (मन) (शब्द ‘अंतरु’ और ‘अंतरि’ का फर्क समझने के लिए देखें ‘गुरबाणी व्याकरण’)। मलि = मल वाला, मलीन।
कीना = किया। भेख = धार्मिक लिबास। उदासी = विरक्त, जगत की ओर से उपराम। हिरदै कमलु न चीना = हृदय का कमल पुष्प नहीं पहचाना। घटि = घट में, हृदय में।1।

अगर (किसी मनुष्य ने) अंदरूनी मलीन (मन) साफ नहीं किया, पर बाहर से (शरीर पर) साधूओं वाला भेस बनाया हुआ है, अगर उसने अपने हृदय रूपी कमल को नहीं परखा, अगर उसने अपने अंदर परमात्मा को नहीं देखा, तो सन्यास धारण करने का कोई लाभ नहीं।1।