Guruvaani - 513
पउड़ी ॥ भगत सचै दरि सोहदे सचै सबदि रहाए ॥ हरि की प्रीति तिन ऊपजी हरि प्रेम कसाए ॥ हरि रंगि रहहि सदा रंगि राते रसना हरि रसु पिआए ॥ सफलु जनमु जिन्ही गुरमुखि जाता हरि जीउ रिदै वसाए ॥ बाझु गुरू फिरै बिललादी दूजै भाइ खुआए ॥११॥
रहाए = टिकाए हुए। प्रेम कसाए = प्रेम के खीचे हुए। दूजै भाइ = (ईश्वर के बिना) और के प्यार में। खुआए = खोए हुए, वंचित हुई। दरि = दर पर।11।
बंदगी करने वाले सच्चे प्रभु की हजूरी में शोभा पाते हैं, (प्रभु की हजूरी में वह) सच्चे शब्द के द्वारा टिके रहते हैं, उनके अंदर प्रभु का प्यार पैदा होता है, (वह) प्रभु के प्यार के खिंचे हुए हैं, वह सदा प्रभु के प्यार में रहते हैं, प्रभु के रंग में रंगे रहते हैं और जीभ से प्रभु का नाम-रस पीते हैं। जिन्होंने गुरु के सन्मुख हो के रब को पहचाना है और दिल में बसाया है उनका पैदा होना मुबारक है।
गुरु के बिना सृष्टि और-और प्यार में गलतान है बिलकती फिरती है।11।
सलोकु मः ३ ॥ कलिजुग महि नामु निधानु भगती खटिआ हरि उतम पदु पाइआ ॥ सतिगुर सेवि हरि नामु मनि वसाइआ अनदिनु नामु धिआइआ ॥ विचे ग्रिह गुर बचनि उदासी हउमै मोहु जलाइआ ॥ आपि तरिआ कुल जगतु तराइआ धंनु जणेदी माइआ ॥ ऐसा सतिगुरु सोई पाए जिसु धुरि मसतकि हरि लिखि पाइआ ॥ जन नानक बलिहारी गुर आपणे विटहु जिनि भ्रमि भुला मारगि पाइआ ॥१॥
कलि = झगड़े, कष्ट। जुग = संसार, जीवन (देखें शलोक 1 पौड़ी 10 ‘इस जुग महि’)। भगती = भक्ति के द्वारा।
कुल = सारा। जणेदी = पैदा होने वाली। मसतकि = माथे पर। विटहु = से। भ्रमि = भुलेखे में। मारगि = रस्ते पर।1।
इस झमेलों भरे जगत में परमात्मा का नाम (ही) खजाना है, जिसने बंदगी करके (ये खजाना) कमा लिया है उसने प्रभु (का मेल रूप) उच्च दर्जा पा लिया है, गुरु के हुक्म में चल के उसने प्रभु का नाम अपने मन में बसाया है और हर वक्त नाम स्मरण किया है, सतिगुरु के वचन में (चल के) वह गृहस्थ में ही उदासी है (क्योंकि) उसने अहंकार से मोह जला लिया है, वह (इस झमेलों भरे संसार-समुंदर से) खुद लांघ गया है, सारे जगत को भी लंघाता है, धंन है उसकी पैदा करने वाली माँ!
ऐसा गुरु (जिसको मिल के मनुष्य ‘आपि तरिआ कुल जगतु तराइआ’) उसी आदमी को मिलता है जिसके माथे पर धुर से कर्तार ने (बंदगी करने के लेख) लिख के रख दिए हैं। हे दास नानक! (कह:) मैं अपने गुरु से सदके हूँ जिसने मुझे भटके हुए को सद्-मार्ग पर डाला है।1।
मः ३ ॥ त्रै गुण माइआ वेखि भुले जिउ देखि दीपकि पतंग पचाइआ ॥ पंडित भुलि भुलि माइआ वेखहि दिखा किनै किहु आणि चड़ाइआ ॥ दूजै भाइ पड़हि नित बिखिआ नावहु दयि खुआइआ ॥ जोगी जंगम संनिआसी भुले ओन्हा अहंकारु बहु गरबु वधाइआ ॥ छादनु भोजनु न लैही सत भिखिआ मनहठि जनमु गवाइआ ॥ एतड़िआ विचहु सो जनु समधा जिनि गुरमुखि नामु धिआइआ ॥ जन नानक किस नो आखि सुणाईऐ जा करदे सभि कराइआ ॥२॥
दीपक = दीए पर। पतंग = पतंगा। दिखा = देखें। किहु = कुछ। आणि = ला के। दूजै भाइ = माया के प्यार में। बिखिआ = माया। दयि = परमात्मा ने (‘दय’ ने)। जंगम = शिव के उपासक जो सिर पर मोर के पंख रखते हैं और घंटियां बजा के माँगते फिरते हैं। गरबु = अहंकार। छादनु = कपड़ा। सत भिखिआ = श्रद्धा से दी हुई भिक्षा। न लैही = नहीं लेते। समधा = समाधि वाला, टिके हुए मन वाला, पूर्ण अवस्था वाला।2।
(सारे जीव, क्या विद्वान और क्या त्यागी) त्रैगुणी माया को देख के (जीवन के सही राह से) भटक रहे हैं (और दुखी हो रहे हें) जैसे पतंगा (दीपक को) देख के दीपक पर ही जलता है; पण्डित (वैसे तो और लोगों को कथा सुनाते हैं, पर) बार-बार भटक के माया की ओर ही देखते हैं कि देखें किसी ने कुछ ला के भेटा रखी है (अथवा नहीं), सो माया के प्यार में वह (असल में) सदा माया (की संथ्या ही) पढ़ते हैं, परमात्मा ने उनको (अपने) नाम से वंचित कर दिया है।
जोगी-जंगम और सन्यासी (अपनी तरफ से संयासी बने हुए हैं, पर ये भी जीवन के राह से) भटके हुए हैं (क्योंकि एक तो अपने ‘त्याग’ का ही) इनके गुमान ने अहंकार को बढ़ाया हुआ है, (दूसरा, गृहस्थियों से आदर-मान से मिला कपड़ा व भोजन-रूप भिक्षा नहीं लेते) (भाव, थोड़ी चीज मिलने पर उन्हें घूरते हैं; सो, इन्होंने भी) मन के हठ से (इस धारण किए हुए ‘त्याग’ के कारण) अपनी जिंदगी व्यर्थ गवाई है।
इन सभी में से वही मनुष्य पूर्ण-अवस्था वाला है जिसने सनमुख हो के नाम स्मरण किया है। पर, हे दास! (इस त्रैगुणी माया के हाथ से) और किस के आगे पुकार करें? सभी तो प्रभु के प्रेरे हुए ही काम कर रहे हैं, (सो, इस माया से बचने के लिए प्रभु के आगे की हुई अरदास ही सहायता करती है)।2।
पउड़ी ॥ माइआ मोहु परेतु है कामु क्रोधु अहंकारा ॥ एह जम की सिरकार है एन्हा उपरि जम का डंडु करारा ॥ मनमुख जम मगि पाईअन्हि जिन्ह दूजा भाउ पिआरा ॥ जम पुरि बधे मारीअनि को सुणै न पूकारा ॥ जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै गुरमुखि निसतारा ॥१२॥
परेतु = भूत। एह = ये मोह काम क्रोध आदि सारे। डंडु = डंडा। करारा = करड़ा। मगि = रास्ते पर। सिरकार = रईअत, प्रजा। पाईअन्हि = पाए जाते हैं। जमपुरि = जम के शहर में। मारीअनि = मारते हैं।12।
माया का मोह, काम, क्रोध व अहंकार (ये, जैसे) भूत हैं; ये सारे जमराज की प्रजा हैं, इन पर यमराज का डंडा (तगड़ा शासन) चलता है। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे जिन्हें माया का प्यार मीठा लगता है जमराज के राह पर पाए जाते हैं (भाव, वह यम की रईअत कामादिकों के वश पड़ जाते हैं), वह मनमुख जम-पुरी में बंधे हुए (भाव, जम की प्रजा कामादिकों के वश में पड़े हुए) मारे जाते हैं (दुखी होते हैं), कोई उनकी पुकार नहीं सुनता (भाव, इन कामादिकों के पँजों से उन्हें कोई छुड़ा नहीं सकता)।
जिस मनुष्य पर प्रभु स्वयं मेहर करे उसको गुरु मिलता है, गुरु के द्वारा (इन भूतों से) छुटकारा होता है।12।
सलोकु मः ३ ॥ हउमै ममता मोहणी मनमुखा नो गई खाइ ॥ जो मोहि दूजै चितु लाइदे तिना विआपि रही लपटाइ ॥ गुर कै सबदि परजालीऐ ता एह विचहु जाइ ॥ तनु मनु होवै उजला नामु वसै मनि आइ ॥ नानक माइआ का मारणु हरि नामु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥१॥
ममता = (मम = मेरी। ममता = ये विचार कि वह चीज मेरी बन जाए या मेरी है) अपनत्व। मोहणी = मोह लेने वाली, ठगनी, चुड़ैल। लपटाइ = चिपक के। परजालीऐ = अच्छी तरह जलाई जाती है। मारणु = (संख्या आदि जहर को) कुश्ता करने वाली बूटी।1।
अहंकार और ममता (स्वरूप वाली माया, जैसे) चुड़ैल है जो मन-मर्जी करने वालों को हड़प कर जाती है, जो मनुष्य (ईश्वर को छोड़ के किसी) और के मोह में चित्त जोड़ते हैं उनको चिपक के अपने वश में कर लेती है। अगर गुरु के शब्द से इसे अच्छी तरह जलाएं (जैसे, चिपके हुए भूतों-चुड़ैलों को मांदरी लोग आग से जलाने का डरावा देते सुने जाते हैं) तो ये अंदर से निकलती है; शरीर और मन स्वच्छ हो जाता है; प्रभु का नाम मन में आ बसता है।
हे नानक! इस माया (संख्या को कुश्ता करने, बेअसर करने) की बूटी एक हरि-नाम ही है जो गुरु से ही मिल सकती है।1।
मः ३ ॥ इहु मनु केतड़िआ जुग भरमिआ थिरु रहै न आवै जाइ ॥ हरि भाणा ता भरमाइअनु करि परपंचु खेलु उपाइ ॥ जा हरि बखसे ता गुर मिलै असथिरु रहै समाइ ॥ नानक मन ही ते मनु मानिआ ना किछु मरै न जाइ ॥२॥
केतड़िआ जुग = कई जुग, बहुत लंबा अरसा। हरि भाणा = प्रभु की रजा में। भरमाइअनु = भरमाया उस (प्रभु) ने। परपंचु = ठगने वाला (संस्कृत: प्रपंच, ये दिखाई देता जगत जो कई रंगों वाला है और छलावे में डालता है)। जाइ = पैदा होता है।2।
(मनुष्य का) ये मन कई जुग भटकता रहता है (परमात्मा में) टिकता नहीं और पैदा होता मरता रहता है; पर ये बात प्रभु को (इसी तरह) भाती है कि उसने ये ठगने वाली (जगत खेल बना के) (जीवों को इसमें) भरमाया हुआ है।
जब प्रभु (स्वयं) मेहर करता है तो (जीव को) गुरु मिलता है, (फिर) यह (प्रभु में) जुड़ के टिका रहता है; (इस तरह) हे नानक! मन अंदर से ही (प्रभु के नाम में) पतीज जाता है, फिर इसका ना कुछ मरता है ना पैदा होता है।2।