Guruvaani - 477
आगम निरगम जोतिक जानहि बहु बहु बिआकरना ॥ तंत मंत्र सभ अउखध जानहि अंति तऊ मरना ॥२॥
आगम = शास्त्र। निरगम = निगम, वेद। जानहि = (जो लोग) जानते हैं। तंत = टूणे जादू। अउखध = दवाईआं।2।
जो लोग शास्त्र-वेद-ज्योतिष और कई व्याकरण जानते हैं, जो मनुष्य जादू-टूणे मंत्र और दवाएं जानते हैं, उनका भी जनम-मरण का चक्कर नहीं खत्म होता।2।
राज भोग अरु छत्र सिंघासन बहु सुंदरि रमना ॥ पान कपूर सुबासक चंदन अंति तऊ मरना ॥३॥
भोग = मौजें। सिंघासन = सिंहासन, तख्त। सुंदरि रमना = सुंदर स्त्रीयां। सुबासक चंदन = सोहणी सुगंधि देने वाला चंदन।3।
कई ऐसे हैं जो राज (पाट) की मौजें लेते हैं,सिंहासन पर बैठते हैं, जिनके सिर पर छत्र झूलते हैं, (महलों में) सुंदर नारियां हैं, जो पान-कपूर-सुगंधि देने वाले चंदन का प्रयोग करते हैं; मौत का चक्र उनके सिर पर भी मौजूद है।3।
बेद पुरान सिम्रिति सभ खोजे कहू न ऊबरना ॥ कहु कबीर इउ रामहि ज्मपउ मेटि जनम मरना ॥४॥५॥
कहु = कहीं भी। ऊबरना = (जनम मरन के चक्कर से) बचाव। इउ = इस वास्ते। जंपउ = मैं जपता हूँ, मैं स्मरण करता हूँ। मेटि = मिटाता है।4।
हे कबीर! कह: वेद-पुराण-स्मृतियां सारे खोज के देखे हैं (प्रभु के नाम की ओट के बिना और कहीं भी जनम-मरन के चक्र से बचाव नहीं मिलता; सो मैं तो परमात्मा का नाम स्मरण करता हूँ, प्रभु का नाम ही जनम-मरण मिटाता है।4।5।
आसा ॥ फीलु रबाबी बलदु पखावज कऊआ ताल बजावै ॥ पहिरि चोलना गदहा नाचै भैसा भगति करावै ॥१॥
फीलु = हाथी। पखावज = जोड़ी बजाने वाला। कऊआ = कौआ।1।
(मन का) हाथी (वाला स्वभाव) रबाबी (बन गया है), बैल (वाला स्वभाव) जोड़ी बजाने वाला (हो गया है) और कौए (वाला स्वभाव) ताल बजा रहा है। गधा (गधे वाला स्वभाव) (प्रेम रूपी) चोला पहन के नाच रहा है और भैंसा (अर्थात, भैंसे वाला स्वभाव) भक्ति करता है।1।
राजा राम ककरीआ बरे पकाए ॥ किनै बूझनहारै खाए ॥१॥ रहाउ॥
राजा राम = हे सुंदर राम! ककरीआ = धतूरे की खखड़ियां। आबरे पकाए = पके हुए आम। किनै = किसी विरले ने। बूझनहारै = ज्ञानवान ने।1। रहाउ।
हे मेरे सुंदर राम! धतूरे की खखड़ियां अब आम बन गई हैं, पर खाई किसी विरले विचारवान ने है।
बैठि सिंघु घरि पान लगावै घीस गलउरे लिआवै ॥ घरि घरि मुसरी मंगलु गावहि कछूआ संखु बजावै ॥२॥
बैठि घर = अंदर टिक के। सिंघु = हिंसा वाला स्वभाव निर्दयता। पान लगावै = (बारातियों के लिए) पान तैयार करता है (अर्थात, सबकी सेवा करने का उद्यम करता है)। घीस = छछूंदर, मन की छछूंदर वाला स्वभाव, तृष्णा। गलउरे = पानों के बीड़े। ‘घीस...लिआवै’ = भाव, पहले मन इतना तृष्णा के अधीन था कि खुद ही नहीं संतुष्ट होता था, पर अब औरों की सेवा करता है। घरि घरि = हरेक घर में, हरेक गोलक स्थान में। मुसरी = चुहियां, इंद्रिय।
कछूआ = मन का कछूए वाला स्वभाव, मनुष्यों से संकोच, कायरता, मन का सत्संग से डरना। संखु बजावै = भाव, वह मन जो पहले खुद सत्संग से डरता था, अब और लोगों को उपदेश करता है।2।
(मन-) सिंह अपने स्वै-स्वरूप में टिक के (अर्थात, मन का निर्दयता वाला स्वभाव हट के अब यह) सेवा के लिए तत्पर रहता है और (मन-) छछूंदर पानों के बीड़े बाँट रहा है (भाव, मन तृष्णा छोड़ के औरों की सेवा करता है)। सारी इंद्रिय अपने-अपने घरों में रह के हरि-यश रूपी मंगल गा रही हैं और (वही) मन (जो पहले) कछुआ (था, अर्थात, जो पहले सत्संग से दूर भागता था, अब) और लोगों को उपदेश कर रहा है।2।
बंस को पूतु बीआहन चलिआ सुइने मंडप छाए ॥ रूप कंनिआ सुंदरि बेधी ससै सिंघ गुन गाए ॥३॥
बंस को पूतु = बाँझ स्त्री का पुत्र, माया का पुत्र, माया ग्रसित मन।
सुइने मंडप छाए = सोने के शामयाने ताने गए, दसवाँ द्वार में प्रकाश ही प्रकाश हो गया, अंदर खिड़ाव ही खिड़ाव हो गया। रूप कंनिआ सुंदरि = वह सुंदरी जो कन्या रूप है, जो कुआरी है, विकारों के संग से बची हुई है, भाव, विकार रहित रुचि। बेधी = बेध दी, वश में कर ली, व्याह ली। ससै = सहे ने (खरगोश ने), विकारों में पड़ के कमजोर हो गए मन ने। सिंघ गुन = हरि के गुण।3।
(जो पहिले) माया में ग्रसित (था, वह) मन (स्वच्छ सूझ) बयाहने चल पड़ा है, (अब) अंदर आनंद ही आनंद बन गया है। उस मन ने (हरि के साथ जुड़ी वह सूझ-रूपी) सुंदरी से विवाह कर लिया है जो विकारों से कवारी है (और अब वह मन जो पहले विकारों में पड़ने के कारण) डरा था, (भाव, सहमा हुआ था, अब) निर्भय हरि के गुण गाता है।3।
कहत कबीर सुनहु रे संतहु कीटी परबतु खाइआ ॥ कछूआ कहै अंगार भि लोरउ लूकी सबदु सुनाइआ ॥४॥६॥
कीटी = कीड़ी, नम्रता।
परबत = (मन का) अहंकार। कछूआ = सर्द मेहरी, कोरापन।
अंगारु = सेक, तपश, गर्मी, प्यार, हमदर्दी। लोरउ = चाहता हूँ। लूकी = गत्ती, जो अंधेरे में रहती है और डंक मारती है, भाव, (मन की) अज्ञानता जो जीव को अंधकार में रखती है और दुखी करती है। लूकी सबदु सुणाइआ = अज्ञानता पलट के ज्ञान बन गई है, और अब मन और लोगों को भी उपदेश देने लग पड़ा है।4।
कबीर कहता है: हे संत जनो! सुनो (अब मन की) विनम्रता ने अहंकार को मार दिया है। (मन का) कोरापन (हट गया है, और मन) कहता है, मुझे हमदर्दी (की तपश) चाहिए, (अब मन इमानदारी हमदर्दी के गुण का चाहवान है)। (मन की) अज्ञानता पलट के ज्ञान बन गई है और (अब मन और लोगों को) गुरु का शब्द सुना रहा है।4।6।
आसा ॥ बटूआ एकु बहतरि आधारी एको जिसहि दुआरा ॥ नवै खंड की प्रिथमी मागै सो जोगी जगि सारा ॥१॥
बटूआ = (संस्कृत: वर्तुल; प्राकृत बट्ठल Plural बटूआ) वह थैला जिसमें जोगी विभूत डाल के रखता है। एकु = एक प्रभु नाम। बहतरि = बहत्तर बड़ी नाड़ियों वाला शरीर। आधारी = झोली। जिसहि = जिस शरीर रूपी झोली को। एको दुआरा = (प्रभु से मिलने के लिए) एक ही (दसवाँ द्वार रूप) दरवाजा है। नवै खंड की = नौ खंडों वाली, नौ गोलकों वाली (देही)। प्रिथमी = शरीर रूप धरती। जगि = जगत में। सारा = श्रेष्ठ।1।
वह जोगी एक प्रभु नाम को अपना बटूआ बनाता है, बहत्तर बड़ी नाड़ियों वाले शरीर को झोली बनाता है, जिस शरीर में प्रभु को मिलने के लिए (दिमाग़ रूप) एक ही दरवाजा है। वह जोगी इस शरीर के अंदर ही टिक के (प्रभु के दर से नाम की) भिक्षा मांगता है (हमारी नजरों में तो) वह जोगी जगत में सबसे श्रेष्ठ है।1।
ऐसा जोगी नउ निधि पावै ॥ तल का ब्रहमु ले गगनि चरावै ॥१॥ रहाउ॥
नउ निधि = नौ खजाने। ब्रहमु = परमात्मा। तल का ब्रहमु = परमात्मा की वह अंशजो नीचे ही टिकी रहती है, माया में फसी आत्मा। गगनि = आकाश में, ऊपर माया के प्रभाव से ऊँचा।1। रहाउ।
जो मनुष्य माया-ग्रसित आत्मा को उठा के माया के प्रभाव से ऊँचा ले जाता है, वह है असल जोगी, जिसे (मानो) नौ खजाने मिल जाते हैं।1। रहाउ।
खिंथा गिआन धिआन करि सूई सबदु तागा मथि घालै ॥ पंच ततु की करि मिरगाणी गुर कै मारगि चालै ॥२॥
खिंथा = गोदड़ी। मथि = मथ के, मरोड़ के। घालै = पहनता है। पंच ततु = शरीर जो पाँच तत्वों का बना है। मिरगाणी = मृगछाला, आसन। पंज...मिरगाणी = शरीर को आसन बना के, शरीर के मोह को पैरों के नीचे रख के, देह अध्यास को समाप्त करके। मारगि = रास्ते पर। चालै = चलते है।2।
असल जोगी ज्ञान की गोदड़ी बनाता है, प्रभु चरणों में जुड़ी हुई तवज्जो की सूई तैयार करता है, गुरु का शब्द रूपी धागा मरोड़ के (भाव, बारंबार शब्द की कमाई करके) उस सूई में डालता है, शरीर के मोह को पैरों के तले दे के सतिगुरु के बताए हुए राह पर चलता है।2।
दइआ फाहुरी काइआ करि धूई द्रिसटि की अगनि जलावै ॥ तिस का भाउ लए रिद अंतरि चहु जुग ताड़ी लावै ॥३॥
फाहुरी = धूएं की राख एकत्र करने वाली पहौड़ी। धूई = धूआँ, धूणी। दृष्टि = (हर जगह प्रभु को देखने वाली) नजर। तिस का = उस प्रभु का। भाउ = प्यार। चहु जुग = सदा ही, अटल। ताड़ी लावै = तवज्जो जोड़ी रखता है।3।
असल जोगी अपने शरीर की धूणी बना के उस में (प्रभु को हर जगह देखने वाली) नजर की आग जलाता है (और इस शरीर रूपी धूएं में भले गुण एकत्र करने के लिए) दया को पहौड़ी बनाता है, उस परमात्मा का प्यार अपने हृदय में बसाता है और इस तरह सदा के लिए अपनी तवज्जो प्रभु-चरणों में जोड़े रखता है।3।
सभ जोगतण राम नामु है जिस का पिंडु पराना ॥ कहु कबीर जे किरपा धारै देइ सचा नीसाना ॥४॥७॥
जोगतण = योग कमाने का उद्यम। पिंडु = शरीर। देइ = देता है। सचा = सदा टिका रहने वाला। नीसाना = निशान, माथे पर नूर।4।
हे कबीर! कह: जिस प्रभु का दिया हुआ ये शरीर और जीवात्मा है, उसका नाम स्मरणा सबसे अच्छा योग का काम है। यदि प्रभु खुद मेहर करे तो वह ये सदा-स्थिर रहने वाला नूर बख्शता है।4।7।
आसा ॥ हिंदू तुरक कहा ते आए किनि एह राह चलाई ॥ दिल महि सोचि बिचारि कवादे भिसत दोजक किनि पाई ॥१॥
कहा मे = कहाँ से? किनि = किस ने? एह राह = हिन्दू और मुसलमान की मर्यादा के ये रास्ते। कवादे = हे बुरे झगड़ालू!।1।
बुरे झगड़ालू (अपने मत को सच्चा साबित करने के लिए बहस करने की जगह, अस्लियत ढूँढने के लिए) अपने दिल में सोच और विचार कर कि हिन्दू और मुसलमान (एक परमात्मा के बिना और) कहाँ से पैदा हुए हैं, (प्रभु के बिना और) किस ने ये रास्ते चलाए; (जब दोनों मतों के बंदे रब ने ही पैदा किए हैं, तो वह किस तरह भेद-भाव कर सकता है? सिर्फ मुसलमान अथवा हिन्दू होने से ही) किसने बहिश्त पाया और किस ने दोजक? (भाव, सिर्फ मुसलमान कहलवाने से ही बहिश्त नहीं मिल जाता, और हिंदू रहने से दोजक नहीं मिलता)।1।
काजी तै कवन कतेब बखानी ॥ पड़्हत गुनत ऐसे सभ मारे किनहूं खबरि न जानी ॥१॥ रहाउ॥
तै = तू। बखानी = बता रहा है। गुनत = विचारते।1। रहाउ।
हे काजी! तू कौन सी किताबों में से बता रहा है (कि मुसलमान को बहिश्त और हिन्दू को दोजक मिलेगा)? (हे काज़ी!) तेरे जैसे पढ़ने और विचारने वाले (भाव, जो मनुष्य तेरी तरह तअसुब की पट्टी आँखों के आगे बाँध के मज़हबी किताबें पढ़ते हैं) सब ख्वार होते हैं। किसी को अस्लियत की समझ नहीं पड़ी।1। रहाउ।
सकति सनेहु करि सुंनति करीऐ मै न बदउगा भाई ॥ जउ रे खुदाइ मोहि तुरकु करैगा आपन ही कटि जाई ॥२॥
सकति = स्त्री। सनेहु = प्यार। सुंनति = मुसलमानों की मज़हबी रस्म; छोटी उम्र में लड़के की इन्द्रीय का सिरे का मास काट देते हैं। बदउगा = मानूँगा। भाई = हे भाई! जउ = अगर। रे = हे भाई! मोहि = मुझे।2।
(यह) सुंन्नत (तो) औरत के प्यार की खातिर की जाती है। हे भाई! मैं नहीं मान सकता (कि इसका रब से मिलने से कोई संबंध है)। यदि रब ने मुझे मुसलमान बनाना हुआ, तो मेरी सुन्नत अपने आप ही हो जाएगी।2।
सुंनति कीए तुरकु जे होइगा अउरत का किआ करीऐ ॥ अरध सरीरी नारि न छोडै ता ते हिंदू ही रहीऐ ॥३॥
कीए = करने से। किआ करीऐ = क्या किया जाए? अरधसरीरी = आधे शरीर वाली, आधे शरीर की मालिक, मनुष्य के आधे की मालिक, सदा की साथी। नारि = नारी। ता ते = इस लिए।3।
पर, अगर सिर्फ सुन्नत करके ही मुसलमान बन सकते हैं, तो औरत की सुन्नत तो हो ही नहीं सकती। पत्नी मनुष्य के जीवन की हर वक्त की सांझीवाल है, ये तो किसी भी वक्त साथ नहीं छोड़ती। सो, (आधा इधर आधा उधर रहने से बेहतर) हिन्दू बने रहना ही ठीक है।3।
छाडि कतेब रामु भजु बउरे जुलम करत है भारी ॥ कबीरै पकरी टेक राम की तुरक रहे पचिहारी ॥४॥८॥
बउरे = हे कमले! पचि हारी = खपते रहे, ख्वार हुए।4।
हे भाई! मज़हबी किताबों की बहसें छोड़ के परमात्मा का भजन कर (बंदगी छोड़ के, और बहसों में पड़ के) तू अपने आप पर बड़ा जुलम कर रहा है। कबीर ने तो एक परमात्मा (के स्मरण) का आसरा लिया है, (झगड़ालू) मुसलमान (बहिसों में ही) ख्वार हो रहे हैं।4।8।