Guruvaani - 462

मीना जलहीन मीना जलहीन हे ओहु बिछुरत मन तन खीन हे कत जीवनु प्रिअ बिनु होत ॥ सनमुख सहि बान सनमुख सहि बान हे म्रिग अरपे मन तन प्रान हे ओहु बेधिओ सहज सरोत ॥ प्रिअ प्रीति लागी मिलु बैरागी खिनु रहनु ध्रिगु तनु तिसु बिना ॥ पलका न लागै प्रिअ प्रेम पागै चितवंति अनदिनु प्रभ मना ॥ स्रीरंग राते नाम माते भै भरम दुतीआ सगल खोत ॥ करि मइआ दइआ दइआल पूरन हरि प्रेम नानक मगन होत ॥२॥

मीना = मछली। जल हीन = पानी के बिना। खीन = कमजोर, क्षीण। कत = कैसे? प्रिअ बिनु = प्यारे के बिना। सनमुख = सामने, मुंह पर। सहि = सहता है। बान = तीर। म्रिग = हिरन। अरपै = भेटा कर देता है। प्रान = प्राण, जिंद। बेधिओ = बेधा जाता है। सहज सरोत = आत्मिक अडोलता वाले नाद को सुन के। प्रिअ = हे प्यारे! बैरागी = उदास चिक्त। ध्रिग = धिक्कारयोग्य। तनु = शरीर। पलका न लागै = आँखों की पलकें नहीं इकट्ठी होती। पागै = पग, चरण। अनदिनु = हर वक्त। स्री रंग = श्रीरंग, लक्ष्मी का पति, परमात्मा। स्री = श्री, लक्ष्मी। माते = मस्त। भै = सारे डर। दुतीआ = दूसरा, माया का। भरम दुतीआ = माया के पीछे भटकना। मइआ = तरस, दया। दइआल = हे दयालु! पूरन = हे सर्व-व्यापक! नानक = हे नानक!।2।

हे भाई! जब मछली पानी से विछुड़ जाती है, जब मछली पानी से विछुड़ जाती है, पानी से विछुड़ने से उसका मन उसका शरीर निढाल हो जाता है। प्यारे (पानी) के बिना वह कैसे जी सकती है?
हे भाई! हिरन आत्मिक जीवन देने वाली (घंडे हेड़े की आवाज) सुन के अपना मन अपना शरीर अपने प्राण (सब कुछ उस मीठी सुर से) सदके कर देता है, (और) सीधा मुंह पर वह (शिकारी का) तीर सहता है, सामने मुंह रख के तीर सहता है।
हे प्यारे! मेरी प्रीति (तेरे चरणों में) लग गई है। (हे प्रभु! मुझे) मिल, मेरा चिक्त (दुनिया की ओर से) उदास है। हे भाई! उस प्यारे के मिलाप के बिना यदि ये शरीर एक छिन भी टिका रह सके तो ये शरीर धिक्कारयोग्य है।
हे प्यारे प्रभु! मुझे नींद नहीं आती, तेरे चरणों में मेरी प्रीति लगी हुई है, मेरा मन हर वक्त तुझे ही याद कर रहा है।
हे भाई! जो भाग्यशाली परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं जो उसके नाम में मस्त हो जाते हैं, वे दुनिया के सारे डर, माया की भटकना- ये सब कुछ दूरकर लेते हैं। हे नानक! (कह:) हे सर्व-व्यापक दयालु हरि! मेरे पे मेहर कर, तरस कर, मैं सदा तेरे प्यार में मस्त रहूँ।2।


अलीअल गुंजात अलीअल गुंजात हे मकरंद रस बासन मात हे प्रीति कमल बंधावत आप ॥ चात्रिक चित पिआस चात्रिक चित पिआस हे घन बूंद बचित्रि मनि आस हे अल पीवत बिनसत ताप ॥ तापा बिनासन दूख नासन मिलु प्रेमु मनि तनि अति घना ॥ सुंदरु चतुरु सुजान सुआमी कवन रसना गुण भना ॥ गहि भुजा लेवहु नामु देवहु द्रिसटि धारत मिटत पाप ॥ नानकु ज्मपै पतित पावन हरि दरसु पेखत नह संताप ॥३॥

अलि = भौरा। अलीअल = अलिकुल, भौरे। गुंजात = गुंजन करते हैं। मकरंद = फूल के बीच की धूड़ी। बासन = सुगंधि। मात = मस्त। आप = आपु, अपने आप को। चात्रिक = पपीहा। घन = बूँद। अल = अलि, मस्त कर देने वाला रस। ताप = दुख-कष्ट। तनि = तन में, हृदय में। घना = बहुत। सुजान = सयाना। रसना = जीभ (से)। भना = मैं उचारूँ। गहि = पकड़ के। द्रिसटि = दृष्टि, नजर, निगा। जंपै = विनती करता है। पतित पावन = हे पतितों को पवित्र करने वाले!।3।

(हे भाई! कमल के फूलों पे मंडराने वाले) भौरे गुंजन करते हैं, भौरे नित्य गुंजन करते हैं, कमल फूलों के मकरंद के रस की सुगंधि में मस्त होते हैं, प्रीति में खिंचे हुए वह अपने आपे को कमल-पुष्प में बंद करवा लेते हैं।
(हे भाई! चाहे सरोवर और तालाब पानी से भरे पड़े हैं, (पर) पपीहे के चिक्त को (बादलों के बूँद की) प्यास है, पपीहे की चाहत (सिर्फ बादलों की बूँद से) तृप्त होती है, उसके मन में बादलों के बूँद की ही तमन्ना है। जब पपीहा उस मस्त करा देने वाली बूँद को पीता है,तो उसकी तपश मिटती है।
हे जीवों के दुख-कष्ट नाश करने वाले! ताप नाश करने वाले! (मेरी तेरे दर पर विनती है, मुझे) मिल, मेरे मन में मेरे हृदय में (तेरे चरणों के प्रति) बहुत गहरा प्रेम है। तू मेरा सुंदर चतुर सियाना मालिक है। मैं (अपनी) जीभ से तेरे कौन-कौन से गुण बयान करूँ?
हे विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाले हरि! मुझे बाँह से पकड़ के अपने चरणों से लगा लो। मुझे अपना नाम बख्शो। तेरी निगाह मेरे ऊपर पड़ते ही मेरे सारे पाप मिट जाते हैं। नानक विनती करता है: हे हरि! तेरे दर्शन करने से कोई दुख-कष्ट छू नहीं सकता।3।


चितवउ चित नाथ चितवउ चित नाथ हे रखि लेवहु सरणि अनाथ हे मिलु चाउ चाईले प्रान ॥ सुंदर तन धिआन सुंदर तन धिआन हे मनु लुबध गोपाल गिआन हे जाचिक जन राखत मान ॥ प्रभ मान पूरन दुख बिदीरन सगल इछ पुजंतीआ ॥ हरि कंठि लागे दिन सभागे मिलि नाह सेज सोहंतीआ ॥ प्रभ द्रिसटि धारी मिले मुरारी सगल कलमल भए हान ॥ बिनवंति नानक मेरी आस पूरन मिले स्रीधर गुण निधान ॥४॥१॥१४॥

चितवउ = मैं चितवता हूँ। नाथ = हे नाथ! अनाथ = मुझ अनाथ को। चाईले = चाव भरे। लुबध = लालची। जाचिक = भिखारी। मान = आदर। बिदीरन = नाश करने वाला। कंठि = गले से। सभागे = भाग्यशाली। नाह = नाथ। प्रभ = हे प्रभु! मुरारी = हे मुरारी! क्लमल = पाप। स्रीधर = श्रीधर, लक्ष्मी पति। निधान = खजाना।4।

हे मेरे पति-प्रभु! मैं चिक्त (में तुझे ही) चितवता हूँ, हे नाथ! मैं चिक्त में तुझे ही याद करता हूँ। मुझ अनाथ को अपनी शरण में रख ले। (हे नाथ! मुझे) मिल (तुझे मिलने के लिए मेरे अंदर) चाव है, मेरी जीवात्मा तेरे दर्शनों के लिए उत्साह में आए हुई है।
हे प्रभु! तेरे सुंदर स्वरूप में मेरी तवज्जो जुड़ी हुई है, तेरे सुंदर शरीर की ओर मेरा ध्यान लगा हुआ है। हे गोपाल! मेरा मन तेरे साथ गहरी सांझ पाने के लिए ललचा रहा है। तू उन (भाग्यशालियों) का आदर रखता है जो तेरे दर पे भिखारी बनते हैं।
हे प्रभु! (तू) अपने दर के मंगतों का आदर-मान करता है, तू उनके दुखों का नाश करता है, (तेरी मेहर से उनकी) सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
हे भाई! जो (भाग्यशाली मनुष्य) प्रभु-पति के गले लगते हैं, उनकी (जिंदगी) के दिन भाग्यशाली हो जाते हैं, पति प्रभु को मिल के उनके हृदय की सेज सोहणी बन जाती है। जिस पे प्रभु मेहर की निगाह करता है, जिनको परमात्मा मिल जाता है, उनके (पिछले किए) सारे पाप नाश हो जाते हैं।
नानक विनती करता है: (हे भाई!) लक्ष्मी पति प्रभु सारे गुणों का खजाना-प्रभु मुझे मिल गया है, मेरी मन की मुराद पूरी हो गई है।4।1।14।35।


ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥

ੴ = इक ओअंकार। ‘ओअंकार’ संस्कृत के ‘ओअं’ शब्द से लिया गया है। ये शब्द ‘ओअं’ सबसे पहले उपनिषदों में इस्तेमाल हुआ। ‘मण्डूक्य’ उपनिषद में लिखा है कि जो कुछ हो चुका है, जो इस वक्त मौजूद है और जो होगा, ये ‘ओअं’ ही है।
उपनिष्दों के उपरांत ये शब्द ‘ओअं’ विष्णू, शिव और ब्रहमा के समुदाय के लिए बरता गया।
‘ओअंकार’ शब्द ‘अकाल पुरख’ के अर्थ में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में आता है, जैसे;
ओअंकार ब्रहमा उतपति॥ ओअंकार कीआ जिनि चिति॥ ओअंकारि सैल जुग भए॥ ओअंकार बेद निरमए॥ (रामकली महला १ दखणी, ओअंकारु)
शब्द ‘एकंकार’ भी (जो ‘ੴ’ एक ओअंकार का अच्चारण है) श्री गुरु ग्रंथ साहिब में बरता गया है, जैसे: एकम एकंकारु निराला॥ अमरु अजोनी जाति न जाला॥ (बिलावल महला १ थिती घरु १० जति)
सतिनामु = जिसका नाम ‘सति’ है। शब्द ‘सति’ संस्कृत की धातु ‘अस’ से है, जिसका अर्थ है ‘होना’। ‘सति’ का संस्कृत रूप ‘सत्य’ है। इसका अर्थ है ‘अस्तित्व वाला’। ‘सतिनामु’ का अर्थ है, ‘वह एक ओअंकार जिसका नाम है अस्तित्व वाला’।
पुरखु: संस्कृत में व्युत्पत्ति के अनुसार इसके अर्थ ऐसे किए गए है: ‘पुरि शेते इति पुरष: ’। भाव, जो शरीर में लेटा हुआ है। संस्कृत में शब्द ‘पुरखु’ का प्रचलित अर्थ है ‘मनुष्य’। भगवत गीता में ‘पुरुष’ ‘आत्मा’ अर्थ में बरता गया है। ‘रघुवंश’ पुस्तक में ये शब्द ‘ब्रह्माण्ड की आत्मा’ के अर्थों में आया है। इसी तरह पुस्तक ‘शिशुपाल वध’ में भी।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब में ‘पुरखु’ के अर्थ हैं वह ओअंकार जो सारे जगत में व्यापक है, वह आत्मा जो सारी सृष्टि में रम रहा है। ‘मनुष्य’ और ‘आत्मा’ अर्थ में भी कई जगह ये शब्द आया है।
अकाल मूरति: शब्द ‘मूरति’ (-‘मूर्ति’) स्त्रीलिंग है। अकाल इसका विशेषण है। इसलिए ये स्त्रीलिंग रूप में लिखा गया है। अगर शब्द ‘अकाल’ अकेला ही ‘पुरखु’ ‘निरभउ’ ‘निरवैरु’ की तरह ‘ੴ’ एक ओअंकार का गुणवाचक होता, तो पुलिंग रूप में होता, भाव, तो इसके अंत में ‘ु’ की मात्रा होती (‘मूरति’ की जगह ‘मूरतु’)।

अकाल-पुरख एक है; जिसका नाम ‘अस्तित्व वाला’ है, जो सृष्टि का रचनहार है।, जो सब में व्यापक है, भय से रहित है, वैर रहित है, जिसका स्वरूप काल से परे है, (भाव, जिसका शरीर नाश-रहित है) जो जूनियों में नहीं आता, जिसका प्रकाश अपने आप से हुआ है और जो सतिगुरु की कृपासे मिलता है।


आसा महला १ ॥ वार सलोका नालि सलोक भी महले पहिले के लिखे


टुंडे अस राजै की धुनी ॥

धुनी = सुर।

(यह वार) टुंडे (राजा) असराज की (वार की) सुर में (गानी है।)।


सलोकु मः १ ॥ बलिहारी गुर आपणे दिउहाड़ी सद वार ॥ जिनि माणस ते देवते कीए करत न लागी वार ॥१॥

दिउहाड़ी = दिहाड़ी में। सद वार = सौ बार। जिनि = जिस (गुरु) ने। माणस ते = मनुष्य से। करत = बनाते हुए। वार = देर, समय।

मैं अपने गुरु से (एक) दिन में सौ बार सदके जाता हूँ, जिस (गुरु) ने मनुष्यों से देवते बना दिए और बनाते हुए (थोड़ा सा) भी समय ना लगा।1।