*Guruvaani - 424*
*कलि कीरति सबदु पछानु ॥ एहा भगति चूकै अभिमानु ॥ सतिगुरु सेविऐ होवै परवानु ॥ जिनि आसा कीती तिस नो जानु ॥२॥*
कीरति = महिमा। कलि = इस जगत में। चूकै = खत्म होता है। सेविऐ = सेवा करने से। जिनि = जिस परमात्मा ने।2।
```(हे भाई! इस विकार-ग्रसित) जगत में परमात्मा की महिमा करता रह, गुरु के शब्द से जान-पहचान बनाए रख। परमात्मा की भक्ति ही है (जिसकी इनायत से मन में से) अहंकार दूर होता है, और गुरु की बताई सेवा करने से मनुष्य परमात्मा की हजूरी में स्वीकार हो जाता है। (हे भाई! इन आशाओं के जाल में से निकलने के लिए) उस परमात्मा से गहरी सांझ बना जिसने आशा (मनुष्य के मन में) पैदा की है।2।```
*तिसु किआ दीजै जि सबदु सुणाए ॥ करि किरपा नामु मंनि वसाए ॥ इहु सिरु दीजै आपु गवाए ॥ हुकमै बूझे सदा सुखु पाए ॥३॥*
तिसु = उस (गुरु) को। दीजै = दें। जि = जो। मंनि = मनि, मन में। आपु = स्वै भाव, अहंम्। गवाइ = गवा के।3।
```(हे भाई!) जो (गुरु अपना) शब्द सुनाता है और मेहर करके परमात्मा का नाम (हमारे) मन में बसाता है उसे कौन सी भेटा देनी चाहिए? (हे भाई!) स्वै भाव दूर करके अपना ये सिर (गुरु के आगे) भेट करना चाहिए (जो मनुष्य अपने आप को गुरु के हवाले करता है वह) परमात्मा की रजा को समझ के सदा आत्मिक आनंद में रहता है।3।```
*आपि करे तै आपि कराए ॥ आपे गुरमुखि नामु वसाए ॥ आपि भुलावै आपि मारगि पाए ॥ सचै सबदि सचि समाए ॥४॥*
तै = और। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। मारगि = रास्ते पर। सबदि = शब्द द्वारा। सचि = सदा-स्थिर प्रभु में।4।
```(हे भाई! सब जीवों में व्यापक हो के) परमात्मा सब कुछ स्वयं ही कर रहा है, और स्वयं ही जीवों से करवाता है। वह स्वयं ही गुरु के द्वारा (मनुष्य के मन में अपना) नाम बसाता है। परमात्मा स्वयं ही कुमार्ग पर डालता है स्वयं ही सही रास्ते पर लाता है (जिसे सही रास्ते पर लाता है वह मनुष्य) सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में जुड़ के सदा-स्थिर हरि-नाम में लीन रहता है।4।```
*सचा सबदु सची है बाणी ॥ गुरमुखि जुगि जुगि आखि वखाणी ॥ मनमुखि मोहि भरमि भोलाणी ॥ बिनु नावै सभ फिरै बउराणी ॥५॥*
जुगि जुगि = हरेक युग में। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला। मोहि = मोह में। भरमि = भटकना में। बउराणी = कमली, पागल।5।
```(हे भाई!) सदा-स्थिर प्रभु की महिमा का शब्द ही सदा स्थिर प्रभु के महिमा की वाणी ही हरेक युग में दुनिया गुरु के माध्यम से उचारती आई है (और माया के मोह के भ्रम से बचती आई है)। पर, अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (हरेक युग में ही) माया के मोह में फसा रहा, माया की भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर पड़ा रहा। (हे भाई!) परमात्मा के नाम से टूट के (हरेक युग में ही) पागल हो के दुनिया भटकती रही है।5।```
*तीनि भवन महि एका माइआ ॥ मूरखि पड़ि पड़ि दूजा भाउ द्रिड़ाइआ ॥ बहु करम कमावै दुखु सबाइआ ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ ॥६॥*
मूरखि = मूर्ख ने। करम = (निहित धार्मिक) कर्म। सबाइआ = सारा ही।6।
```(हे भाई!) तीनों ही भवनों में एक ही माया का प्रभाव चला आ रहा है। मूर्ख मनुष्य ने (गुरु से टूट के स्मृतियों-शास्त्रों आदि को) पढ़-पढ़ के (अपने अंदर बल्कि) माया का प्यार ही पक्का किया। मूर्ख मनुष्य (गुरु से टूट के शास्त्रों अनुसार निहित) अनेक धार्मिक कर्म करता है और निरा दुख ही सहेड़ता है। गुरूकी बताई सेवा करके ही मनुष्य सदा टिके रहने वाले आत्मिक आनंद का रस लेता है।6।```
*अम्रितु मीठा सबदु वीचारि ॥ अनदिनु भोगे हउमै मारि ॥ सहजि अनंदि किरपा धारि ॥ नामि रते सदा सचि पिआरि ॥७॥*
अंम्रित सबदु = आत्मिक जीवन देने वाला शब्द। मारि = मार के। सहजि = आत्मिक अडोलता में। अनंदि = आनंद में। नामि = नाम मे। रते = रंगे हुए। सचि = सदा स्थिर में। पिआरि = प्यार में।7।
```हे भाई! गुरु के शब्द को विचार के (और, अपने अंदर से) अहंकार दूर करके (भाग्यशाली मनुष्य) आत्मिक जीवन देने वाला स्वादिष्ट नाम रस हर वक्त पा सकता है। (गुरु) कृपा करके उसको आत्मिक अडोलता में आत्मिक आनंद में टिकाए रखता है। (हे भाई!) परमात्मा के नाम-रंग में रंगे हुए मनुष्य सदा प्रभु-प्यार में मगन रहते हैं सदा-स्थिर हरि-नाम में लीन रहते हैं।7।```
*हरि जपि पड़ीऐ गुर सबदु वीचारि ॥ हरि जपि पड़ीऐ हउमै मारि ॥ हरि जपीऐ भइ सचि पिआरि ॥ नानक नामु गुरमति उर धारि ॥८॥३॥२५॥*
जपि = जन के, जपें। वीचारि = विचार के। भइ = भय में।8।
```हे भाई! गुरु के शब्द को अपनी सोच-मण्डल में टिका के (और अंदर से) अहंकार दूर करके परमात्मा के नाम का ही जाप करना चाहिए परमात्मा का नाम ही पढ़ना चाहिए, परमात्मा के डर-अदब में रहके सदा-स्थिर हरि के प्रेम में मस्त हो के हरि-नाम का जाप ही करना चाहिए।```
```हे नानक! (कह: हे भाई!) गुरु की मति ले कर परमात्मा का नाम अपने हृदय में टिकाए रख।8।3।25।```
*ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु आसा महला ३ असटपदीआ घरु ८ काफी ॥*
ते = से। ऊपजै = पैदा होती है। जिनि = जिस (गुरु) ने। वडिआई = आदर मान।1।
चेति = स्मरण कर। भाई = हे भाई! भजि = दौड़ के।1। रहाउ।
गिआनु = ज्ञान, आत्मिक जीवन की सूझ। ततु = अस्लियत। भंडारा = खजाने।2।
गुरमुखि = गुरु के द्वारा। सलाह = महिमा। अंतरि = हृदय में। अपारा = बेअंत का।3।
निरमलु = पवित्र।4।
आपु = स्वै भाव, अहम्। पसरि रही = व्याप्त है।5।
गुरि = गुरु ने। ऊतम = श्रेष्ठ। अंतरु = अंदर का, हृदय (शब्द ‘अंतरि’ और ‘अंतरु’ में फर्क स्मरणीय है)।6।
करेई = करे, करता है। किलविख = पाप। कटीअहि = काटे जाते हैं। बिघनु = रूकावट।7।
```हे मेरे भाई! जिस गुरु ने (मेरी) तृष्णा की आग बुझा दी है (तू भी उसकी शरण पड़), गुरु के पास से ही आत्मिक ठंढ प्राप्त होती है। हे भाई! गुरूसे ही परमात्मा का नाम मिलता है (जिसकी इनायत से लोक-परलोक में) बड़ा आदर प्राप्त होता है।1।```
``` हे मेरे भाई! (अगर तू विकारों की आग से बचना चाहता है तो) एक परमात्मा का नाम स्मरण करता रह। जगत को (विकारों में) जलता देख के मैं तो दौड़ के (गुरु की) शरण आ पड़ा हूँ (जिसने मुझे नाम की दाति बख्श दी है)।1। रहाउ।```
``` हे भाई! गुरु से आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त होती है, आत्मिक जीवन की सूझ ही सबसे बड़ी अस्लियत है और श्रेष्ठ विचार है। (हे भाई! मुझे तो) गुरु से ही परमात्मा का ठिकाना मिला है और (मेरे अंदर) परमात्मा की भक्ति के खजाने भर गए हैं।2।```
``` हे मेरे भाई! गुरु की शरण पड़ने से ही प्रभु का नाम स्मरण किया जा सकता है (गुरु की शरण पड़ कर ही मनुष्य) इस विचार को समझ सकता है। गुरु की शरण आने से परमात्मा की भक्ति महिमा प्राप्त होती है, हृदय में बेअंत प्रभु के महिमा का शब्द आ बसता है।3।```
``` हे भाई! जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहता है उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो जाता है, उसे कभी भी कोई दुख नहीं छू सकता। गुरु की शरण पड़ने से (अंदर से) अहंकार दूर कर सकते हैं, मन पवित्र हो जाता है।4।```
``` हे भाई! यदि गुरु मिल जाए तो अहँकार का नाश हो जाता है। यह बात समझ में आ जाती है कि परमात्मा तीनों ही भवनों में व्यापक है, हर जगह परमात्मा की पवित्र ज्योति प्रकाशमान है, (इस तरह) परमात्मा की ज्योति में तवज्जो जुड़ जाती है।5।```
``` हे भाई! (जिस मनुष्य को) पूरे गुरु ने (आत्मिक जीवन की) समझ बख्श दी (उस की) अक्ल श्रेष्ठ हो जाती है, उसका दिल (विकारों की सड़न से बच के) ठंडा-ठार हुआ रहता है, हरि नाम से उसको आनंद प्राप्त होता है।6।```
``` (पर, हे भाई!) पूरा गुरु भी तभी मिलता है जब परमात्मा स्वयं मेहर की निगाह करता है। (जिस को गुरु मिल जाता है उसके) सारे पाप-विकार काटे जाते हैं, उसे फिर कोई दुख नहीं व्याप्तता, उसके जीवन सफर में कोई रुकावट नहीं प्ड़ती।7।```
*गुर ते सांति ऊपजै जिनि त्रिसना अगनि बुझाई ॥ गुर ते नामु पाईऐ वडी वडिआई ॥१॥*
ते = से। ऊपजै = पैदा होती है। जिनि = जिस (गुरु) ने। वडिआई = आदर मान।1।
```हे मेरे भाई! जिस गुरु ने (मेरी) तृष्णा की आग बुझा दी है (तू भी उसकी शरण पड़), गुरु के पास से ही आत्मिक ठंढ प्राप्त होती है। हे भाई! गुरूसे ही परमात्मा का नाम मिलता है (जिसकी इनायत से लोक-परलोक में) बड़ा आदर प्राप्त होता है।1।```
*एको नामु चेति मेरे भाई ॥ जगतु जलंदा देखि कै भजि पए सरणाई ॥१॥ रहाउ॥*
चेति = स्मरण कर। भाई = हे भाई! भजि = दौड़ के।1। रहाउ।
```हे मेरे भाई! (अगर तू विकारों की आग से बचना चाहता है तो) एक परमात्मा का नाम स्मरण करता रह। जगत को (विकारों में) जलता देख के मैं तो दौड़ के (गुरु की) शरण आ पड़ा हूँ (जिसने मुझे नाम की दाति बख्श दी है)।1। रहाउ।```
*गुर ते गिआनु ऊपजै महा ततु बीचारा ॥ गुर ते घरु दरु पाइआ भगती भरे भंडारा ॥२॥*
गिआनु = ज्ञान, आत्मिक जीवन की सूझ। ततु = अस्लियत। भंडारा = खजाने।2।
```हे भाई! गुरु से आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त होती है, आत्मिक जीवन की सूझ ही सबसे बड़ी अस्लियत है और श्रेष्ठ विचार है। (हे भाई! मुझे तो) गुरु से ही परमात्मा का ठिकाना मिला है और (मेरे अंदर) परमात्मा की भक्ति के खजाने भर गए हैं।2।```
*गुरमुखि नामु धिआईऐ बूझै वीचारा ॥ गुरमुखि भगति सलाह है अंतरि सबदु अपारा ॥३॥*
गुरमुखि = गुरु के द्वारा। सलाह = महिमा। अंतरि = हृदय में। अपारा = बेअंत का।3।
```हे मेरे भाई! गुरु की शरण पड़ने से ही प्रभु का नाम स्मरण किया जा सकता है (गुरु की शरण पड़ कर ही मनुष्य) इस विचार को समझ सकता है। गुरु की शरण आने से परमात्मा की भक्ति महिमा प्राप्त होती है, हृदय में बेअंत प्रभु के महिमा का शब्द आ बसता है।3।```
*गुरमुखि सूखु ऊपजै दुखु कदे न होई ॥ गुरमुखि हउमै मारीऐ मनु निरमलु होई ॥४॥*
निरमलु = पवित्र।4।
```हे भाई! जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहता है उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो जाता है, उसे कभी भी कोई दुख नहीं छू सकता। गुरु की शरण पड़ने से (अंदर से) अहंकार दूर कर सकते हैं, मन पवित्र हो जाता है।4।```
*सतिगुरि मिलिऐ आपु गइआ त्रिभवण सोझी पाई ॥ निरमल जोति पसरि रही जोती जोति मिलाई ॥५॥*
आपु = स्वै भाव, अहम्। पसरि रही = व्याप्त है।5।
```हे भाई! यदि गुरु मिल जाए तो अहँकार का नाश हो जाता है। यह बात समझ में आ जाती है कि परमात्मा तीनों ही भवनों में व्यापक है, हर जगह परमात्मा की पवित्र ज्योति प्रकाशमान है, (इस तरह) परमात्मा की ज्योति में तवज्जो जुड़ जाती है।5।```
*पूरै गुरि समझाइआ मति ऊतम होई ॥ अंतरु सीतलु सांति होइ नामे सुखु होई ॥६॥*
गुरि = गुरु ने। ऊतम = श्रेष्ठ। अंतरु = अंदर का, हृदय (शब्द ‘अंतरि’ और ‘अंतरु’ में फर्क स्मरणीय है)।6।
```हे भाई! (जिस मनुष्य को) पूरे गुरु ने (आत्मिक जीवन की) समझ बख्श दी (उस की) अक्ल श्रेष्ठ हो जाती है, उसका दिल (विकारों की सड़न से बच के) ठंडा-ठार हुआ रहता है, हरि नाम से उसको आनंद प्राप्त होता है।6।```
*पूरा सतिगुरु तां मिलै जां नदरि करेई ॥ किलविख पाप सभ कटीअहि फिरि दुखु बिघनु न होई ॥७॥*
करेई = करे, करता है। किलविख = पाप। कटीअहि = काटे जाते हैं। बिघनु = रूकावट।7।
```(पर, हे भाई!) पूरा गुरु भी तभी मिलता है जब परमात्मा स्वयं मेहर की निगाह करता है। (जिस को गुरु मिल जाता है उसके) सारे पाप-विकार काटे जाते हैं, उसे फिर कोई दुख नहीं व्याप्तता, उसके जीवन सफर में कोई रुकावट नहीं प्ड़ती।7।```