Guruvaani - 346

उरवार पार के दानीआ लिखि लेहु आल पतालु ॥ मोहि जम डंडु न लागई तजीले सरब जंजाल ॥३॥

दानीआ = जानने वालो! उरवार पार के दानिया = उस पार और उस पार के जानने वाले! जीवों के लोक = परलोक में किए कामों को जानने वाला! आल पतालु = ऊल जलूल, मन मर्जी की बातें। मोहि = मुझे। डंडु = दण्ड। तजीले = छोड़ दिए हैं।3।

जीवों के लोक-परलोक की सब करतूतें जानने वाले हे चित्रगुप्तो! (मेरे बारे) जो तुम्हारा जीअ करे लिख लेना (भाव, यमराज के पास पेश करने के लिए मेरे कामों में कोई बात तुम्हें मिलनी ही नहीं, क्योंकि प्रभु की कृपा से) मैंने सारे जंजाल छोड़ दिए हैं, तभी तो मुझे जम का दण्ड लगना ही नहीं।3।


जैसा रंगु कसु्मभ का तैसा इहु संसारु ॥ मेरे रमईए रंगु मजीठ का कहु रविदास चमार ॥४॥१॥

रमईए रंगु = सोहाने राम (के नाम) का रंग। मजीठ रंगु = मजीठ का रंग, पक्का रंग जैसे मजीठ का रंग होता है, कभी ना उतरने वाला रंग।4।

हे चमार रविदास! कह: (ज्यों ज्यों मैं राम-नाम का वणज कर रहा हूं, मुझे यकीन आ रहा है कि) ये जगत ऐसे है जैसे कुसंभे का (कच्चा) रंग। और मेरे प्यारे राम के नाम का रंग ऐसा है जैसे मजीठ का (पक्का) रंग।4।


गउड़ी पूरबी रविदास जीउ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

कूप = कूआँ। दादिरा = मेंढक। बिदेसु = परदेस। बूझ = समझ, वाकफियत। ऐसे = इस तरह। बिखिआ = माया। बिमोहिआ = अच्छी तरह मोहा हुआ। आरा पारु = इस पार उस पार। न सूझ = नहीं सूझता।1।
नाइका = हे मालिक! दरसु = दीदार।1। रहाउ।
मलिन = मलीन, मैली। मति = अक्ल। माधवा = हे प्रभु! गति = हालत। लखी न जाइ = पहचानी नहीं जा सकती। भ्रमु = भटकना। चूकई = खत्म हो जाए। मै = मुझे।2।
जोगीसर = जोगी+ईसर, बड़े बड़े जोगी। कथनु नही पावहि = अंत नहीं पा सकते। कै कारणै = की खातिर। प्रेम कै कारणै = प्रेम (की दाति) हासिल करने के लिए। कहु = कह। गुण कहु = गुण बयान कर, महिमा कर। तुअ = तेरे।3।
सतजुगि = सतयुग में। सतु = दान, शास्त्रों की विधि के अनुसार किए हुए दान आदि कर्म। तेता जगी = त्रेता युग यज्ञों में (प्रवृत्त है)। दुआपरि = द्वापर में। पूजाचार = पूजा आचार, देवताओं की पूजा आदि कर्म। द्रिढ़ै = दृढ़ कर रहे हैं, जोर दे रहे हैं। नाम अधार = (श्री राम व श्री कृष्ण अवतार के) नाम का आसरा, श्री राम चंद्र और कृष्ण जी की मूर्ति में तवज्जो/ध्यान जोड़ के उनके नाम का जाप।1।
पारु = संसार समुंदर का परला छोर। पाइबो = पाओगे। रे = हे भाई! हे पंडित! मो कउ = मुझे। कोऊ = इन कर्म काण्डी पंडितों में से कोई भी। आवागवनु = पैदा होना मरना, जनम मरन का चक्कर। बिलाइ = दूर हो जाए।1। रहाउ।
बहु बिधि = कई तरीकों से। बिधि = विधि, तरीका। धरम = शास्त्रों के अनुसार बताए गए हरेक वर्ण-आश्रम के अलग-अलग कर्तव्य। निरूपीऐ = निरूपित, निर्धारित किए गए हैं, हद बंदी की गई है। सभ लोइ = सारा जगत। करता दीसै = उन धार्मिक रस्मों को करता दिखाई दे रहा है। जिह साधे = जिसके साधन से, जिस धार्मिक कर्म के करने से। सिधि = कामयाबी, मानव जनम के उद्देश्य की सफलता।2।
करम = वह धार्मिक रस्में जो शास्त्रों ने निर्धारित किए हैं। अकरम = अ+कर्म, वह काम जो शास्त्रों ने मना किए हैं। सुनि = सुन के। संसा = सहसा, सहम, फिक्र। हिरै = दूर करे।3।
बाहरु = (शरीर का) बाहरी क्षेत्र।उदकि = उदक के साथ, पानी के साथ। पखारीऐ = धो दें। घट = हृदय। बिबिधि = वि+विधि, कई विधियों से, कई किस्म के। होइबो = होवोगे। कुंचर = हाथी। बिउहार = व्यवहार, काम।4।
रवि = सूरज। रजनी = रैन, रात। जथा गति = जैसे दूर हो जाती है। मानो = जानो। कनक = सोना। होत नही बार = चिन्ता नहीं लगती।5।
परम परस = सब पारसों में बढ़िया पारस। भेटीऐ = मिल जाए। लिलाट = माथे पर। उनमन = (संस्कृत: उन्मनस् = Adj.- anxious, eager, impatient) तमन्ना भरा। उनमन मन = वह हृदय जिसमें प्रभु प्रीतम को मिलने की चाहत पैदा हो गई है। मन ही = मनि ही, मन में ही, अंदर ही, अंतरात्मे ही। बजर = वज्र, करड़े, सख्त, पक्के। कपाट = किवाड़, दरवाजे की भित्त।6।
जुगति = तरीका साधन। भगति जुगति = बंदगी-रूप साधन (प्रयोग करके)। मति = बुद्धि। सति करी = पक्की कर ली, दृढ़ कर ली, माया में डोलने से रोक ली। काटि = काट के। सोई = वही मनुष्य। बसि = बस के, टिक के, प्रभु की याद में टिक के। रसि = आनंद से। मन मिले = मन ही मिले, अंतरात्मे ही प्रभु को मिल जाते हैं। निरगुन = माया के तीनों गुणों से रहित प्रभु। गुन बिचार = गुणों की विचार, गुणों की याद।7।
निग्रह = रोकना, मन को रोकना, मन को विकारों की ओर से रोकना। टारी न टरै = टाले नहीं टलती। भ्रम फास = भ्रम की फाही। प्रेम भगति = प्रेमा भक्ति, प्यार भरी याद, प्रभु की प्यार भरी याद। उदास = इन प्रयत्नों से निराश, इन कर्मों धर्मों से उपराम।8।

जैसे (कोई) कूँआ मेंढकों से भरा हो, (उन मेंढकों को) कोई इलम नहीं होता (कि इस कूँएं से बाहर भी कोई और) देस परदेस भी है; वैसे ही मेरा मन माया (के कूँएं) में इतनी गहरी तरह फसा हुआ है कि इसे (माया के कूएं में से निकलने के लिए) कोई इस पार का उस पार का छोर नहीं सूझता।1।
हे सारे भवनों के सरदार! मुझे एक पल भर के लिए (ही) दीदार दे।1। रहाउ।
हे प्रभु! मेरी मति (विकारों से) मैली हुई पड़ी है, (इस वास्ते) मुझे तेरी गती की पहचान नहीं आती (अर्थात, मुझे समझ नहीं आती कि तू कैसा है)। हे प्रभु! मेहर कर, मुझे चतुर मति समझा, (ताकि) मेरा भटकना समाप्त हो जाए।2।
(हे प्रभु!) बड़े-बड़े जोगी (भी) तेरे बेअंत गुणों का अंत नहीं पा सकते, (पर) हे रविदास चमार! तू प्रभु की महिमा कर, ताकि तुझे प्रेम और भक्ति की दाति मिल सके।3।1।
(हे पंडित जी! तुम कहते हो कि हरेक युग में अपना-अपना कर्म ही प्रधान है, इस अनुसार) सतिजुग में दान आदि प्रधान था, त्रेता युग यज्ञों में प्रवृत्त रहा, द्वापर में देवताओं की पूजा प्रधान कर्म था; (इसी तरह तुम कहते हो कि) तीनों युग इन तीनों कर्मों धर्मों पर जोर देते हैं; और अब कलियुग में सिर्फ (राम) नाम का आसरा है।1।
पर हे पण्डित! (इन युगों के बँटे हुए कर्मों धर्मों से, संसार समुंदर का) परला छोर कैसे ढूँढोगे? (तुममें से) कोई भी मुझे ऐसा काम समझा के नहीं बता सका, जिसकी सहायता से (मनुष्य के) जन्म-मरण का चक्कर खत्म हो सकें।1। रहाउ।
(शास्त्रों अनुसार) कई तरीकों से वर्ण आश्रमों के कर्तव्यों की हद-बंदी की गई है; (इन शास्त्रों को मानने वाला) सारा जगत यही निर्धारित कर्म-धर्म कर रहा है। पर किस कर्म-धर्म के करने से (आवागमन से) निजात मिल सकती है? वह कौन सा कर्म है जिसके साधने से जनम-उद्देश्य सफल होता है? - (ये बात तुम नहीं बता सके)।2।
वेदों और पुराणों को सुन के (बल्कि और ही) शंका बढ़ती है। यही विचार करते रह जाते हैं कि भला कौन सा कर्म शास्त्रोंके अनुसार है, और कौन सा कर्म शास्त्रों में वर्जित किया है। (वर्ण-आश्रमों के कर्म-धर्म करते हुए ही, मनुष्य के) दिल में सहम तो टिका रहता है, (फिर) वह कौन सा कर्म-धर्म (तुम बताते हो) जो मन का अहंकार दूर करे?।3।
(हे पण्डित! तूम तीर्थ-सनान पर जोर देते हो, पर तीर्थों पर जा के शरीर का) बाहरी क्षेत्र ही पानी में धोते हैं, दिल में कई किस्म के विकार टिके ही रहते हैं, (इस तीर्थ-स्नान से) कौन पवित्र हो सकता है? ये सुच तो ऐसी ही होती है जैसे हाथी का स्नान-कर्म है।4।
(पर, हे पण्डित!) सारा संसार ये बात जानता है कि सूरज के चढ़ने से कैसे रात (का अंधेरा) दूर हो जाता है। ये बात भी याद रखने वाली है कि तांबे के पारस के साथ छूने से उसके सोना बनने में देर नहीं लगती।5।
(इसी तरह) यदि पूर्बले भाग्य जागें तो सतिगुरु मिल जाता है जो सब पारसों से बढ़िया पारस है। (गुरु की कृपा से) मन में परमात्मा के मिलने की चाहत पैदा हो जाती है, वह अंतरात्मे ही प्रभु से मिल लेता है, मन के कठोर किवाड़ खुल जाते हैं।6।
जिस मनुष्य ने प्रभु की भक्ति में जुड़ के (इस भक्ति की इनायत से) भटकनों, विकारों और माया के बंधनों को काट के अपनी बुद्धि को माया में डोलने से रोक लिया है, वही मनुष्य (प्रभु की याद में) टिक के आनंद से (प्रभु को) अंतर-आत्मा में ही मिल लेता है, और उस एक परमात्मा के गुणों की याद में जुड़ा रहता है, जो माया के तीन गुणों से परे है।7।
(प्रभु की याद के बिना) मन को विकारों से रोकने के अगर अन्य अनेक प्रयत्न भी किए जाएं, (तो भी विकारों में) भटकनों की फाँसी टाले नहीं टलती। (कर्मकांड के) इन यत्नों से प्रभु की प्यार भरी याद (दिल में) पैदा नहीं हो सकती। इसलिए मैं रविदास इन कर्मों-धर्मों से निराश हूँ।8।1।


कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥ ऐसे मेरा मनु बिखिआ बिमोहिआ कछु आरा पारु न सूझ ॥१॥

कूप = कूआँ। दादिरा = मेंढक। बिदेसु = परदेस। बूझ = समझ, वाकफियत। ऐसे = इस तरह। बिखिआ = माया। बिमोहिआ = अच्छी तरह मोहा हुआ। आरा पारु = इस पार उस पार। न सूझ = नहीं सूझता।1।

जैसे (कोई) कूँआ मेंढकों से भरा हो, (उन मेंढकों को) कोई इलम नहीं होता (कि इस कूँएं से बाहर भी कोई और) देस परदेस भी है; वैसे ही मेरा मन माया (के कूँएं) में इतनी गहरी तरह फसा हुआ है कि इसे (माया के कूएं में से निकलने के लिए) कोई इस पार का उस पार का छोर नहीं सूझता।1।


सगल भवन के नाइका इकु छिनु दरसु दिखाइ जी ॥१॥ रहाउ॥

नाइका = हे मालिक! दरसु = दीदार।1। रहाउ।

हे सारे भवनों के सरदार! मुझे एक पल भर के लिए (ही) दीदार दे।1। रहाउ।


मलिन भई मति माधवा तेरी गति लखी न जाइ ॥ करहु क्रिपा भ्रमु चूकई मै सुमति देहु समझाइ ॥२॥

मलिन = मलीन, मैली। मति = अक्ल। माधवा = हे प्रभु! गति = हालत। लखी न जाइ = पहचानी नहीं जा सकती। भ्रमु = भटकना। चूकई = खत्म हो जाए। मै = मुझे।2।

हे प्रभु! मेरी मति (विकारों से) मैली हुई पड़ी है, (इस वास्ते) मुझे तेरी गती की पहचान नहीं आती (अर्थात, मुझे समझ नहीं आती कि तू कैसा है)। हे प्रभु! मेहर कर, मुझे चतुर मति समझा, (ताकि) मेरा भटकना समाप्त हो जाए।2।


जोगीसर पावहि नही तुअ गुण कथनु अपार ॥ प्रेम भगति कै कारणै कहु रविदास चमार ॥३॥१॥

जोगीसर = जोगी+ईसर, बड़े बड़े जोगी। कथनु नही पावहि = अंत नहीं पा सकते। कै कारणै = की खातिर। प्रेम कै कारणै = प्रेम (की दाति) हासिल करने के लिए। कहु = कह। गुण कहु = गुण बयान कर, महिमा कर। तुअ = तेरे।3।

(हे प्रभु!) बड़े-बड़े जोगी (भी) तेरे बेअंत गुणों का अंत नहीं पा सकते, (पर) हे रविदास चमार! तू प्रभु की महिमा कर, ताकि तुझे प्रेम और भक्ति की दाति मिल सके।3।1।


गउड़ी बैरागणि ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सतजुगि = सतयुग में। सतु = दान, शास्त्रों की विधि के अनुसार किए हुए दान आदि कर्म। तेता जगी = त्रेता युग यज्ञों में (प्रवृत्त है)। दुआपरि = द्वापर में। पूजाचार = पूजा आचार, देवताओं की पूजा आदि कर्म। द्रिढ़ै = दृढ़ कर रहे हैं, जोर दे रहे हैं। नाम अधार = (श्री राम व श्री कृष्ण अवतार के) नाम का आसरा, श्री राम चंद्र और कृष्ण जी की मूर्ति में तवज्जो/ध्यान जोड़ के उनके नाम का जाप।1।
पारु = संसार समुंदर का परला छोर। पाइबो = पाओगे। रे = हे भाई! हे पंडित! मो कउ = मुझे। कोऊ = इन कर्म काण्डी पंडितों में से कोई भी। आवागवनु = पैदा होना मरना, जनम मरन का चक्कर। बिलाइ = दूर हो जाए।1। रहाउ।
बहु बिधि = कई तरीकों से। बिधि = विधि, तरीका। धरम = शास्त्रों के अनुसार बताए गए हरेक वर्ण-आश्रम के अलग-अलग कर्तव्य। निरूपीऐ = निरूपित, निर्धारित किए गए हैं, हद बंदी की गई है। सभ लोइ = सारा जगत। करता दीसै = उन धार्मिक रस्मों को करता दिखाई दे रहा है। जिह साधे = जिसके साधन से, जिस धार्मिक कर्म के करने से। सिधि = कामयाबी, मानव जनम के उद्देश्य की सफलता।2।
करम = वह धार्मिक रस्में जो शास्त्रों ने निर्धारित किए हैं। अकरम = अ+कर्म, वह काम जो शास्त्रों ने मना किए हैं। सुनि = सुन के। संसा = सहसा, सहम, फिक्र। हिरै = दूर करे।3।
बाहरु = (शरीर का) बाहरी क्षेत्र।उदकि = उदक के साथ, पानी के साथ। पखारीऐ = धो दें। घट = हृदय। बिबिधि = वि+विधि, कई विधियों से, कई किस्म के। होइबो = होवोगे। कुंचर = हाथी। बिउहार = व्यवहार, काम।4।
रवि = सूरज। रजनी = रैन, रात। जथा गति = जैसे दूर हो जाती है। मानो = जानो। कनक = सोना। होत नही बार = चिन्ता नहीं लगती।5।
परम परस = सब पारसों में बढ़िया पारस। भेटीऐ = मिल जाए। लिलाट = माथे पर। उनमन = (संस्कृत: उन्मनस् = Adj.- anxious, eager, impatient) तमन्ना भरा। उनमन मन = वह हृदय जिसमें प्रभु प्रीतम को मिलने की चाहत पैदा हो गई है। मन ही = मनि ही, मन में ही, अंदर ही, अंतरात्मे ही। बजर = वज्र, करड़े, सख्त, पक्के। कपाट = किवाड़, दरवाजे की भित्त।6।
जुगति = तरीका साधन। भगति जुगति = बंदगी-रूप साधन (प्रयोग करके)। मति = बुद्धि। सति करी = पक्की कर ली, दृढ़ कर ली, माया में डोलने से रोक ली। काटि = काट के। सोई = वही मनुष्य। बसि = बस के, टिक के, प्रभु की याद में टिक के। रसि = आनंद से। मन मिले = मन ही मिले, अंतरात्मे ही प्रभु को मिल जाते हैं। निरगुन = माया के तीनों गुणों से रहित प्रभु। गुन बिचार = गुणों की विचार, गुणों की याद।7।
निग्रह = रोकना, मन को रोकना, मन को विकारों की ओर से रोकना। टारी न टरै = टाले नहीं टलती। भ्रम फास = भ्रम की फाही। प्रेम भगति = प्रेमा भक्ति, प्यार भरी याद, प्रभु की प्यार भरी याद। उदास = इन प्रयत्नों से निराश, इन कर्मों धर्मों से उपराम।8।

(हे पंडित जी! तुम कहते हो कि हरेक युग में अपना-अपना कर्म ही प्रधान है, इस अनुसार) सतिजुग में दान आदि प्रधान था, त्रेता युग यज्ञों में प्रवृत्त रहा, द्वापर में देवताओं की पूजा प्रधान कर्म था; (इसी तरह तुम कहते हो कि) तीनों युग इन तीनों कर्मों धर्मों पर जोर देते हैं; और अब कलियुग में सिर्फ (राम) नाम का आसरा है।1।
पर हे पण्डित! (इन युगों के बँटे हुए कर्मों धर्मों से, संसार समुंदर का) परला छोर कैसे ढूँढोगे? (तुममें से) कोई भी मुझे ऐसा काम समझा के नहीं बता सका, जिसकी सहायता से (मनुष्य के) जन्म-मरण का चक्कर खत्म हो सकें।1। रहाउ।
(शास्त्रों अनुसार) कई तरीकों से वर्ण आश्रमों के कर्तव्यों की हद-बंदी की गई है; (इन शास्त्रों को मानने वाला) सारा जगत यही निर्धारित कर्म-धर्म कर रहा है। पर किस कर्म-धर्म के करने से (आवागमन से) निजात मिल सकती है? वह कौन सा कर्म है जिसके साधने से जनम-उद्देश्य सफल होता है? - (ये बात तुम नहीं बता सके)।2।
वेदों और पुराणों को सुन के (बल्कि और ही) शंका बढ़ती है। यही विचार करते रह जाते हैं कि भला कौन सा कर्म शास्त्रोंके अनुसार है, और कौन सा कर्म शास्त्रों में वर्जित किया है। (वर्ण-आश्रमों के कर्म-धर्म करते हुए ही, मनुष्य के) दिल में सहम तो टिका रहता है, (फिर) वह कौन सा कर्म-धर्म (तुम बताते हो) जो मन का अहंकार दूर करे?।3।
(हे पण्डित! तूम तीर्थ-सनान पर जोर देते हो, पर तीर्थों पर जा के शरीर का) बाहरी क्षेत्र ही पानी में धोते हैं, दिल में कई किस्म के विकार टिके ही रहते हैं, (इस तीर्थ-स्नान से) कौन पवित्र हो सकता है? ये सुच तो ऐसी ही होती है जैसे हाथी का स्नान-कर्म है।4।
(पर, हे पण्डित!) सारा संसार ये बात जानता है कि सूरज के चढ़ने से कैसे रात (का अंधेरा) दूर हो जाता है। ये बात भी याद रखने वाली है कि तांबे के पारस के साथ छूने से उसके सोना बनने में देर नहीं लगती।5।
(इसी तरह) यदि पूर्बले भाग्य जागें तो सतिगुरु मिल जाता है जो सब पारसों से बढ़िया पारस है। (गुरु की कृपा से) मन में परमात्मा के मिलने की चाहत पैदा हो जाती है, वह अंतरात्मे ही प्रभु से मिल लेता है, मन के कठोर किवाड़ खुल जाते हैं।6।
जिस मनुष्य ने प्रभु की भक्ति में जुड़ के (इस भक्ति की इनायत से) भटकनों, विकारों और माया के बंधनों को काट के अपनी बुद्धि को माया में डोलने से रोक लिया है, वही मनुष्य (प्रभु की याद में) टिक के आनंद से (प्रभु को) अंतर-आत्मा में ही मिल लेता है, और उस एक परमात्मा के गुणों की याद में जुड़ा रहता है, जो माया के तीन गुणों से परे है।7।
(प्रभु की याद के बिना) मन को विकारों से रोकने के अगर अन्य अनेक प्रयत्न भी किए जाएं, (तो भी विकारों में) भटकनों की फाँसी टाले नहीं टलती। (कर्मकांड के) इन यत्नों से प्रभु की प्यार भरी याद (दिल में) पैदा नहीं हो सकती। इसलिए मैं रविदास इन कर्मों-धर्मों से निराश हूँ।8।1।


सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार ॥ तीनौ जुग तीनौ दिड़े कलि केवल नाम अधार ॥१॥

सतजुगि = सतयुग में। सतु = दान, शास्त्रों की विधि के अनुसार किए हुए दान आदि कर्म। तेता जगी = त्रेता युग यज्ञों में (प्रवृत्त है)। दुआपरि = द्वापर में। पूजाचार = पूजा आचार, देवताओं की पूजा आदि कर्म। द्रिढ़ै = दृढ़ कर रहे हैं, जोर दे रहे हैं। नाम अधार = (श्री राम व श्री कृष्ण अवतार के) नाम का आसरा, श्री राम चंद्र और कृष्ण जी की मूर्ति में तवज्जो/ध्यान जोड़ के उनके नाम का जाप।1।

(हे पंडित जी! तुम कहते हो कि हरेक युग में अपना-अपना कर्म ही प्रधान है, इस अनुसार) सतिजुग में दान आदि प्रधान था, त्रेता युग यज्ञों में प्रवृत्त रहा, द्वापर में देवताओं की पूजा प्रधान कर्म था; (इसी तरह तुम कहते हो कि) तीनों युग इन तीनों कर्मों धर्मों पर जोर देते हैं; और अब कलियुग में सिर्फ (राम) नाम का आसरा है।1।


पारु कैसे पाइबो रे ॥ मो सउ कोऊ न कहै समझाइ ॥ जा ते आवा गवनु बिलाइ ॥१॥ रहाउ॥

पारु = संसार समुंदर का परला छोर। पाइबो = पाओगे। रे = हे भाई! हे पंडित! मो कउ = मुझे। कोऊ = इन कर्म काण्डी पंडितों में से कोई भी। आवागवनु = पैदा होना मरना, जनम मरन का चक्कर। बिलाइ = दूर हो जाए।1। रहाउ।

पर हे पण्डित! (इन युगों के बँटे हुए कर्मों धर्मों से, संसार समुंदर का) परला छोर कैसे ढूँढोगे? (तुममें से) कोई भी मुझे ऐसा काम समझा के नहीं बता सका, जिसकी सहायता से (मनुष्य के) जन्म-मरण का चक्कर खत्म हो सकें।1। रहाउ।


बहु बिधि धरम निरूपीऐ करता दीसै सभ लोइ ॥ कवन करम ते छूटीऐ जिह साधे सभ सिधि होइ ॥२॥

बहु बिधि = कई तरीकों से। बिधि = विधि, तरीका। धरम = शास्त्रों के अनुसार बताए गए हरेक वर्ण-आश्रम के अलग-अलग कर्तव्य। निरूपीऐ = निरूपित, निर्धारित किए गए हैं, हद बंदी की गई है। सभ लोइ = सारा जगत। करता दीसै = उन धार्मिक रस्मों को करता दिखाई दे रहा है। जिह साधे = जिसके साधन से, जिस धार्मिक कर्म के करने से। सिधि = कामयाबी, मानव जनम के उद्देश्य की सफलता।2।

(शास्त्रों अनुसार) कई तरीकों से वर्ण आश्रमों के कर्तव्यों की हद-बंदी की गई है; (इन शास्त्रों को मानने वाला) सारा जगत यही निर्धारित कर्म-धर्म कर रहा है। पर किस कर्म-धर्म के करने से (आवागमन से) निजात मिल सकती है? वह कौन सा कर्म है जिसके साधने से जनम-उद्देश्य सफल होता है? - (ये बात तुम नहीं बता सके)।2।


करम अकरम बीचारीऐ संका सुनि बेद पुरान ॥ संसा सद हिरदै बसै कउनु हिरै अभिमानु ॥३॥

करम = वह धार्मिक रस्में जो शास्त्रों ने निर्धारित किए हैं। अकरम = अ+कर्म, वह काम जो शास्त्रों ने मना किए हैं। सुनि = सुन के। संसा = सहसा, सहम, फिक्र। हिरै = दूर करे।3।

वेदों और पुराणों को सुन के (बल्कि और ही) शंका बढ़ती है। यही विचार करते रह जाते हैं कि भला कौन सा कर्म शास्त्रोंके अनुसार है, और कौन सा कर्म शास्त्रों में वर्जित किया है। (वर्ण-आश्रमों के कर्म-धर्म करते हुए ही, मनुष्य के) दिल में सहम तो टिका रहता है, (फिर) वह कौन सा कर्म-धर्म (तुम बताते हो) जो मन का अहंकार दूर करे?।3।


बाहरु उदकि पखारीऐ घट भीतरि बिबिधि बिकार ॥ सुध कवन पर होइबो सुच कुंचर बिधि बिउहार ॥४॥

बाहरु = (शरीर का) बाहरी क्षेत्र।उदकि = उदक के साथ, पानी के साथ। पखारीऐ = धो दें। घट = हृदय। बिबिधि = वि+विधि, कई विधियों से, कई किस्म के। होइबो = होवोगे। कुंचर = हाथी। बिउहार = व्यवहार, काम।4।

(हे पण्डित! तूम तीर्थ-सनान पर जोर देते हो, पर तीर्थों पर जा के शरीर का) बाहरी क्षेत्र ही पानी में धोते हैं, दिल में कई किस्म के विकार टिके ही रहते हैं, (इस तीर्थ-स्नान से) कौन पवित्र हो सकता है? ये सुच तो ऐसी ही होती है जैसे हाथी का स्नान-कर्म है।4।


रवि प्रगास रजनी जथा गति जानत सभ संसार ॥ पारस मानो ताबो छुए कनक होत नही बार ॥५॥

रवि = सूरज। रजनी = रैन, रात। जथा गति = जैसे दूर हो जाती है। मानो = जानो। कनक = सोना। होत नही बार = चिन्ता नहीं लगती।5।

(पर, हे पण्डित!) सारा संसार ये बात जानता है कि सूरज के चढ़ने से कैसे रात (का अंधेरा) दूर हो जाता है। ये बात भी याद रखने वाली है कि तांबे के पारस के साथ छूने से उसके सोना बनने में देर नहीं लगती।5।


परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट ॥ उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट ॥६॥

परम परस = सब पारसों में बढ़िया पारस। भेटीऐ = मिल जाए। लिलाट = माथे पर। उनमन = (संस्कृत: उन्मनस् = Adj.- anxious, eager, impatient) तमन्ना भरा। उनमन मन = वह हृदय जिसमें प्रभु प्रीतम को मिलने की चाहत पैदा हो गई है। मन ही = मनि ही, मन में ही, अंदर ही, अंतरात्मे ही। बजर = वज्र, करड़े, सख्त, पक्के। कपाट = किवाड़, दरवाजे की भित्त।6।

(इसी तरह) यदि पूर्बले भाग्य जागें तो सतिगुरु मिल जाता है जो सब पारसों से बढ़िया पारस है। (गुरु की कृपा से) मन में परमात्मा के मिलने की चाहत पैदा हो जाती है, वह अंतरात्मे ही प्रभु से मिल लेता है, मन के कठोर किवाड़ खुल जाते हैं।6।


भगति जुगति मति सति करी भ्रम बंधन काटि बिकार ॥ सोई बसि रसि मन मिले गुन निरगुन एक बिचार ॥७॥

जुगति = तरीका साधन। भगति जुगति = बंदगी-रूप साधन (प्रयोग करके)। मति = बुद्धि। सति करी = पक्की कर ली, दृढ़ कर ली, माया में डोलने से रोक ली। काटि = काट के। सोई = वही मनुष्य। बसि = बस के, टिक के, प्रभु की याद में टिक के। रसि = आनंद से। मन मिले = मन ही मिले, अंतरात्मे ही प्रभु को मिल जाते हैं। निरगुन = माया के तीनों गुणों से रहित प्रभु। गुन बिचार = गुणों की विचार, गुणों की याद।7।

जिस मनुष्य ने प्रभु की भक्ति में जुड़ के (इस भक्ति की इनायत से) भटकनों, विकारों और माया के बंधनों को काट के अपनी बुद्धि को माया में डोलने से रोक लिया है, वही मनुष्य (प्रभु की याद में) टिक के आनंद से (प्रभु को) अंतर-आत्मा में ही मिल लेता है, और उस एक परमात्मा के गुणों की याद में जुड़ा रहता है, जो माया के तीन गुणों से परे है।7।


अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरै भ्रम फास ॥ प्रेम भगति नही ऊपजै ता ते रविदास उदास ॥८॥१॥

निग्रह = रोकना, मन को रोकना, मन को विकारों की ओर से रोकना। टारी न टरै = टाले नहीं टलती। भ्रम फास = भ्रम की फाही। प्रेम भगति = प्रेमा भक्ति, प्यार भरी याद, प्रभु की प्यार भरी याद। उदास = इन प्रयत्नों से निराश, इन कर्मों धर्मों से उपराम।8।

(प्रभु की याद के बिना) मन को विकारों से रोकने के अगर अन्य अनेक प्रयत्न भी किए जाएं, (तो भी विकारों में) भटकनों की फाँसी टाले नहीं टलती। (कर्मकांड के) इन यत्नों से प्रभु की प्यार भरी याद (दिल में) पैदा नहीं हो सकती। इसलिए मैं रविदास इन कर्मों-धर्मों से निराश हूँ।8।1।