Guruvaani - 317

सलोक मः ५ ॥ गुर नानक हरि नामु द्रिड़ाइआ भंनण घड़ण समरथु ॥ प्रभु सदा समालहि मित्र तू दुखु सबाइआ लथु ॥१॥

द्रिढाइआ = दृढ़ करा दिया, पक्का करा दिया।1।

हे नानक! जो हरि शरीरों को सहजे ही नाश करके बना सकता है, सतिगुरु ने उस हरि का नाम (हमारे हृदय में) परो दिया है (और हमारा सब दुख दूर हो गया है)। हे मित्र! अगर तू (भी) प्रभु को याद करे, तो (तेरे भी) सब दुख समाप्त हो जाएं।1।


मः ५ ॥ खुधिआवंतु न जाणई लाज कुलाज कुबोलु ॥ नानकु मांगै नामु हरि करि किरपा संजोगु ॥२॥

खुधिआ = भूख। संजोगु = मिलाप।2।

(जैसे) भूखा मनुष्य आदर (के वचन) या निरादरी के बुरे बोलों को नहीं जानता (भाव, परवाह नहीं करता और रोटी के लिए सवाल कर देता है, वैसे ही) हे हरि! नानक (भी) तेरा नाम मांगता है, मेहर करके मिलाप बख्श।2।


पउड़ी ॥ जेवेहे करम कमावदा तेवेहे फलते ॥ चबे तता लोह सारु विचि संघै पलते ॥

फलते = फल देते हैं। सारु = करड़ा। पलते = चुभ जाता है।

(अकृतज्ञ) मनुष्य जैसे कर्म करता है, वह कर्म वैसा ही फल देता है; अगर कोई गर्म व करड़ा लोहा चबाए तो वह गले में चुभ जाता है।


घति गलावां चालिआ तिनि दूति अमल ते ॥ काई आस न पुंनीआ नित पर मलु हिरते ॥

घति = डाल के। गलावां = गले का रस्सा। तिनि दूति = उस जमदूत ने। चालिआ = आगे लगा लिया। पुंनीआ = पूरी हुई, सफल हो गई। पर मलु = पराई मैल। हिरते = चुराते हुए।

वह जमदूत (उन खोटे) कर्मों के कारण गले में रस्सा डाल के (भाव, निरादरी का बरताव करके) आगे लगा लेता है। सदा पराई मैल चुराते की (भाव निंदा करके सदा पराए पाप सिर पर लेते की) कोई आस पूरी नहीं होती (लोक और परलोक दोनों बर्बाद जाते हैं)।


कीआ न जाणै अकिरतघण विचि जोनी फिरते ॥ सभे धिरां निखुटीअसु हिरि लईअसु धर ते ॥

जूनियों में भटकता-भटकता वह अकृतज्ञ प्रभु के उपकारों को नहीं समझता (कि उसने मेहर करके मानव जनम बख्शा है), (निंदा आदि के सारे दाँव-पेचों की) उसकी सारी ताकत खत्म हो जाती है, तब (फल भोगने के लिए) प्रभु उसे धरती से उठा लेता है।


विझण कलह न देवदा तां लइआ करते ॥ जो जो करते अहमेउ झड़ि धरती पड़ते ॥३२॥

जब (चारों तरफ) झगड़े को (अकृतज्ञ) समाप्त नहीं होने देता (अर्थात, अति कर देता है) तो कर्तार (उसे) उठा लेता है। (असल बात ये कि) जो जो मनुष्य अहंकार करते हैं वे आखिर जमीन पे ही गिरते हैं।32।


सलोक मः ३ ॥ गुरमुखि गिआनु बिबेक बुधि होइ ॥ हरि गुण गावै हिरदै हारु परोइ ॥ पवितु पावनु परम बीचारी ॥ जि ओसु मिलै तिसु पारि उतारी ॥

बिबेक = परख।

जो मनुष्य सतिगुरु के सन्मुख रहता है, उसमें ज्ञान और विचार वाली बुद्धि होती है; वह हरि के गुण गाता है और हृदय में (गुणों का हार) परो लेता है, (आचरण का) बड़ा शुद्ध और ऊँची मति वाला होता है। जो मनुष्य उसकी संगति करता है उसे भी (संसार सागर से) पार लंघा लेता है।


अंतरि हरि नामु बासना समाणी ॥ हरि दरि सोभा महा उतम बाणी ॥ जि पुरखु सुणै सु होइ निहालु ॥ नानक सतिगुर मिलिऐ पाइआ नामु धनु मालु ॥१॥

बासना = सुगन्धि।1।

उस मनुष्य के हृदय में हरि के नाम (रूपी) सुगन्धि समाई हुई होती है, (जिस कारण) उसकी बोली बड़ी उत्तम होती है और हरि के दरगाह में (उसकी) शोभा होती है। जो मनुष्य (उस बोली को) सुनता है, वह प्रसन्न होता है। हे नानक! सतिगुरु को मिल के उसने ये नाम (रूप) खजाना प्राप्त किया हुआ होता है।1।


मः ४ ॥ सतिगुर के जीअ की सार न जापै कि पूरै सतिगुर भावै ॥ गुरसिखां अंदरि सतिगुरू वरतै जो सिखां नो लोचै सो गुर खुसी आवै ॥ सतिगुरु आखै सु कार कमावनि सु जपु कमावहि गुरसिखां की घाल सचा थाइ पावै ॥

सार = भेद। न जापै = समझा नहीं जा सकता। थाइ पावै = स्वीकार करता है।

सतिगुरु के दिल का भेद मनुष्य को समझ नहीं आ सकता कि सतिगुरु को क्या अच्छा लगता है (सो इस तरह सतिगुरु की प्रसन्नता हासिल करनी कठिन है); (पर हां) सतिगुरु सच्चे सिखों के हृदय में व्यापक है, जो मनुष्य उनकी (सेवा की) तमन्ना रखता है वह सतिगुरु की प्रसन्नता के (दायरे) में आ जाता है, (क्योंकि) जो आज्ञा सतिगुरु देता है वही काम गुरसिख करते हैं, वही भजन करते हैं, सच्चा प्रभु सिखों की मेहनत स्वीकार करता है।


विणु सतिगुर के हुकमै जि गुरसिखां पासहु कमु कराइआ लोड़े तिसु गुरसिखु फिरि नेड़ि न आवै ॥ गुर सतिगुर अगै को जीउ लाइ घालै तिसु अगै गुरसिखु कार कमावै ॥ जि ठगी आवै ठगी उठि जाइ तिसु नेड़ै गुरसिखु मूलि न आवै ॥

जो मनुष्य सतिगुरु के आशय के विरुद्ध गुरसिखों से काम कराना चाहे, गुरु का सिख फिर उसके नजदीक नहीं आता, (पर) जो मनुष्य सतिगुरु की हजूरी में चिक्त जोड़ के (सेवा की मेहनत) करे, गुरसिख उसकी सेवा करता है। जो मनुष्य फरेब करने आता है और फरेब के ख्याल में चला जाता है, उसके नजदीक गुरु का सिख बिल्कुल ही नहीं आता।


ब्रहमु बीचारु नानकु आखि सुणावै ॥ जि विणु सतिगुर के मनु मंने कमु कराए सो जंतु महा दुखु पावै ॥२॥

ब्रहमु बीचारु = ईश्वरीय विचार।2।

नानक कह के सुनाता है (भाव, जोर दे कर सुनाता है कि) शुद्ध सत्य विचार (की बात ये है कि) सतिगुरु का मन पतीजे बिना (भाव, गुरु आशय के विरुद्ध) जो मनुष्य (ठगी आदि करके गुरसिखों से) काम करवाए (भाव, अपनी सेवा करवाए) वह व्यक्ति महा दुख पाता है।2।


पउड़ी ॥ तूं सचा साहिबु अति वडा तुहि जेवडु तूं वड वडे ॥ जिसु तूं मेलहि सो तुधु मिलै तूं आपे बखसि लैहि लेखा छडे ॥

हे बड़ों से बड़े! तू सच्चा मालिक और बहुत बड़ा है, अपने जितना तू खुद ही है। वही मनुष्य तुझे मिलता है, जिसे तू स्वयं मिलाता है और जिसका लेखा छोड़ के तू स्वयं बख्श लेता है।


जिस नो तूं आपि मिलाइदा सो सतिगुरु सेवे मनु गड गडे ॥ तूं सचा साहिबु सचु तू सभु जीउ पिंडु चमु तेरा हडे ॥

जिसको तू खुद मिलाता है वही मन डुबो के (मन लगा के) सतिगुरु की सेवा करता है। तू सच्चा मालिक है, सदा स्थिर रहने वाला है, जीवों का सब कुछ - जिंद, शरीर, चमड़ी, हड्डियां - तेरे ही बख्शे हुए हैं।


जिउ भावै तिउ रखु तूं सचिआ नानक मनि आस तेरी वड वडे ॥३३॥१॥ सुधु ॥

हे बड़ों से भी बड़े! सच्चे प्रभु! जैसे तुझे ठीक लगे वैसे ही हमारी रक्षा कर, नानक के मन में तेरी ही आस है।33।1। सुधु।