*Guruvaani - 300*
*पउड़ी ॥ अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥ मनु तनु सीतलु सांति सहज लागा प्रभ की सेव ॥ टूटे बंधन बहु बिकार सफल पूरन ता के काम ॥ दुरमति मिटी हउमै छुटी सिमरत हरि को नाम ॥ सरनि गही पारब्रहम की मिटिआ आवा गवन ॥ आपि तरिआ कुट्मब सिउ गुण गुबिंद प्रभ रवन ॥ हरि की टहल कमावणी जपीऐ प्रभ का नामु ॥ गुर पूरे ते पाइआ नानक सुख बिस्रामु ॥१५॥*
पउड़ी: अमावसि = मसिआ, जिस रात चाँद बिल्कुल नहीं दिखता। सीतल = ठंडा। सहज = आत्मिक अडोलता। ता के = उस के। दुरमति = बुरी मति। को = का। गही = पकड़ी। आवा गवन = आना-जाना, जनम मरण। कुटंब सिउ = परिवार समेत। रवन = स्मरण (से)। ते = से। सुख बिस्राम = सुखों का ठिकाना परमातमा।15।
```पउड़ी: (हे भाई!) जिस मनुष्य को सतिगुरु ने संतोख बख्शा, उसकी आत्मा सुखी हो गई। (गुरु की कृपा से) वह परमात्मा की सेवा-भक्ति में लगा (जिस करके) उसका मन उसका हृदय ठंडा-ठार हो गया।, उसके अंदर शांति और आत्मिक अडोलता पैदा हो गई।```
```(हे भाई!) परमात्मा का नाम स्मरण करने से अनेक विकारों (के संस्कारों के) बंधन टूट जाते हैं (जो मनुष्य स्मरण करता है) उसके सारे कारज रास आ जाते हैं, उसकी खोटी मति खत्म हो जाती है और उसे अहंकार से मुकती मिल जाती है।```
```(हे भाई!) जिस मनुष्य ने पारब्रहम परमेश्वर का आसरा लिया, उसका जनम-मरण (का चक्र) समाप्त हो जाता है। गोबिंद प्रभु के गुण गाने की इनायत से वह मनुष्य अपने परिवार समेत (संसार-समुंदर से) पार लांध जाता है।```
```(हे भाई!) परमात्मा की सेवा भक्ति करनी चाहिए, परमात्मा का नाम जपना चाहिए। हे नानक! सारे सुखों का मूल वह प्रभु पूरे गुरु की कृपा से मिल जाता है।15।```
*सलोकु ॥ पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥ दिनु दिनु चड़ै सवाइआ नानक होत न घाटि ॥१६॥*
सलोकु: पूरन = कमी रहित जीवन वाला। प्रभ आपि = प्रभु ने आप। दिनु दिनु = दिनो दिन। चढ़ै सवाइआ = बढ़ता है, आत्मिक जीवन में चमकता है। घाटि = (आत्मिक जीवन में) कमी।16।
```सलोकु: हे नानक! जिस मनुष्य को परमात्मा ने खुद पूर्ण जीवन वाला बना दिया वह पूरन मनुष्य कभी (माया के आसरे तले आ के) नहीं डोलता, उसका आत्मिक जीवन दिनो-दिन ज्यादा चमकता है, उसके आत्मिक जीवन में कभी कमी नहीं आती।16।```
*पउड़ी ॥ पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥ जीअ जंत दइआल पुरखु सभ ऊपरि जा का हथु ॥ गुण निधान गोबिंद गुर कीआ जा का होइ ॥ अंतरजामी प्रभु सुजानु अलख निरंजन सोइ ॥ पारब्रहमु परमेसरो सभ बिधि जानणहार ॥ संत सहाई सरनि जोगु आठ पहर नमसकार ॥ अकथ कथा नह बूझीऐ सिमरहु हरि के चरन ॥ पतित उधारन अनाथ नाथ नानक प्रभ की सरन ॥१६॥*
पउड़ी: पूरनमा = पूरनमाशी, जिस रात चाँद पूरा होता है। करण कारण = जगत का मूल। समरथु = सब ताकतों का मालिक। जा का = जिस का। निधान = खजाना। गुर = बड़ा। अंतरजामी = (हरेक के) अंदर की जानने वाला। सुजानु = सियाना। अलख = जिसका सही रूप बयान ना किया जा सके। निरंजन = (निर+अंजन, अंजन = माया की कालिख) माया रहित प्रभु। सभ बिधि = हरेक ढंग। सरनि जोगु = शरण आए की सहायता करने के लायक। अकथ = जिसको बयान ना किया जा सके। पतित = (विकारों में) गिरे हुए।16।
```पउड़ी: सिर्फ परमात्मा ही सारे गुणों से भरपूर है, सारे जगत का मूल हैऔर सारी ताकतों का मालिक है। वह सर्व-व्यापक प्रभु सब जीवों पर दयावान रहता है, सब जीवों पर उस (की सहायता) का हाथ है।```
```वह परमात्मा सारे गुणों का खजाना है, सारी सृष्टि का पालक है, सबसे बड़ा है, सब कुछ उसी का किया घटित होता है। प्रभु सबके दिल की जानने वाला है, समझदार है, उसका संपूर्ण स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता, वह माया के प्रभाव से परे है।```
```(हे भाई!) वह पारब्रहम सबसे बड़ा मालिक है (जीवों के भले का) हरेक ढंग जानने वाला है, संतों का रक्षक है, शरण आए की सहायता करने के लायक है - उस परमात्मा को आठों पहर नमस्कार कर।```
```हे नानक! परमात्मा के सारे गुण बयान नहीं किए जा सकते, उसका सही स्वरूप समझा नहीं जा सकता। उस परमात्मा के चरणों का ध्यान धर। वह परमात्मा (विकारों में) गिरे लोगों को (विकारों से) बचाने वाला है, वह निखसमों का खसम है (अनाथों का नाथ है), उसका आसरा ले।16।```
*सलोकु ॥ दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥ मनि चिंदे फल पाइआ नानक हरि गुन गाइ ॥१७॥*
सलोकु: बिनसे = नाश हो गए। सहसा = सहम। गही = पकड़ी। हरि राइ = प्रभु पातशाह। मनि = मन में। चिंदे = चितवे हुए। नानक = हे नानक! गाइ = गा के।17।
```अर्थ- हे नानक! (जिस मनुष्य ने) प्रभु पातशाह का आसरा लिया, (उसके) सारे दुख नाश हो गए, (उसके अंदर से हरेक किस्म का) सहम दूर हो गया। परमातमा के गुण गा के (उसने अपने) मन में चितवे हुए सारे ही फल हासिल कर लिए।17।```
*पउड़ी ॥ कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥ को उपदेसै को द्रिड़ै तिस का होइ उधारु ॥ किलबिख काटै होइ निरमला जनम जनम मलु जाइ ॥ हलति पलति मुखु ऊजला नह पोहै तिसु माइ ॥*
कोई = जो कोई मनुष्य। को = जो कोई मनुष्य। बीचारु = (परमात्मा के गुणों की) विचार। उपदेसै = और लोगों को उपदेश करता है। द्रिढ़ै = (अपने मन में) पक्का करता है।
उधारु = (पापों, किलविखों से) बचाव। किलविख = पाप। काटै = काट लेता है। निरमला = पवित्र (जीवन वाला)। मलु = (किए विकारों की) मैल। जाइ = दूर हो जाती है। हलति = इस लोक में। पलति = परलोक में। ऊजल = रौशन। पोहै = अपना जोर नहीं डाल सकती। माइ = माया।
```अर्थ- जो कोई मनुष्य (परमात्मा के गुण) गाता है, जो कोई मनुष्य (परमात्मा की महिमा) सुनता है, जो कोई मनुष्य (परमात्मा के गुणों को अपने) मन में बसाता है, जो कोई मनुष्य (परमात्मा की महिमा करने का और लोगों को) उपदेश देता है (और खुद भी उस महिमा को अपने मन में) पक्की तरह टिकाता है, उस मनुष्य का विकारों से बचाव हो जाता है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) विकार काट लेता है। उसका जीवन पवित्र हो जाता है, अनेको जन्मों (के किए हुए विकारों) की मैल (उसके अंदर से) दूर हो जाती है। इस लोक में (भी उसका) मुंह रौशन रहता है (क्योंकि) माया उसपे अपना प्रभाव नहीं डाल सकती।```
*सो सुरता सो बैसनो सो गिआनी धनवंतु ॥ सो सूरा कुलवंतु सोइ जिनि भजिआ भगवंतु ॥ खत्री ब्राहमणु सूदु बैसु उधरै सिमरि चंडाल ॥ जिनि जानिओ प्रभु आपना नानक तिसहि रवाल ॥१७॥*
सुरता = जिसने प्रभु के चरणों में तवज्जो जोड़ी हुई है। बैसनो = स्वच्छ आचरण वाला भक्त। गिआनी = परमात्मा से गहरी सांझ पाने वाला। सूरा = (विकारों का मुकाबला कर सकने वाला) शूरबीर। कुलवंतु = ऊँचे कुल वाला। जिनि = जिस (मनुष्य) ने। भगवंतु = भगवान। सूदु = शूद्र। उधरै = (विकारों से) बच जाता है। सिमरि = स्मरण करके। जानिओ = गहरी सांझ डाली। तिसहि रवाल = उसकी चरण धूल (मांगता है)।
```अर्थ- (हे भाई!) जिस (मनुष्य) ने भगवान का भजन किया है, वही उच्च कुल वाला है, वह (विकारों का टाकरा करने वाला असल) शूरवीर है; वह (असल) धनवान है; वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ वाला है; वह ऊँचे आचरन वाला है; वह प्रभु-चरणों में तवज्जो जोड़े रखने वाला है।```
```(हे भाई! कोई) क्षत्रिय (हो, कोई) ब्राहमण (हो, कोई) शूद्र (हो, कोई) वैश (हो, कोई) चण्डाल (हो, किसी भी वर्ण का हो, परमात्मा का नाम) स्मरण करके (वह विकारों से) बच जाता है। जिस (भी मनुष्य) ने अपने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली है, नानक उसके चरणों की धूल (मांगता है)।17।```
*गउड़ी की वार महला ४ ॥ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥*
समतु = एक जैसा। द्रिसटि = नजर। भावनी = श्रद्धा। सिधि = सफलता। हरि पदु = हरि के साथ मिलाप।1।
बिखु = जहिर। उर = हृदय। सिध = सफल (सिधि = सफलता)। सिरजणहारि = विधाता ने।2।
```सतिगुरु सब जीवों पर मेहर करने वाला है, उसके लिए हरेक जीव एक समान है। वह सब की ओर एक निगाह से देखता है, पर (जीव को अपने उद्यम की) सफलता अपने मन की भावना के कारण होती है (भाव, जैसी मन की भावना तैसी मुराद मिलती है)। सतिगुरु के पास हरि के श्रेष्ठ नाम का अमृत है। (पर) हे नानक! यही हरि-नाम, जीव (प्रभु की) कृपा से स्मरण करता है, सतिगुरु से सन्मुख हो के कोई (भाग्यशाली) ही हासिल कर सकता है।1।```
``` माया से उपजा हुआ अहंकार बिलकुल जहर (का काम करता) है, इसके पीछे लगने से सदा जगत में घाटा है। प्रभु के नाम धन का लाभ सतिगुरु के सन्मुख रहके शब्द के विचार के द्वारा कमाया (जा सकता है), और अहंकार की मैल (रूपी) जहर, प्रभु का अमृत नाम हृदय में धारन करने से उतर जाती है। (ये नाम की दाति प्रभु के हाथ में है), जिस गुरमुखों पर वह कृपा करता है, उनके सारे काम सफल हो जाते हैं। (उन्हें मानव जनम के असल व्यापार में घाटा नहीं पड़ता), (पर) हे नानक! प्रभु को वही मिले हैं, जो दरगाह से मिले हैं, और जिन्हें विधाता हरि ने स्वयं मिलाया है।2।```
*सलोक मः ४ ॥ सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥ एक द्रिसटि करि देखदा मन भावनी ते सिधि होइ ॥ सतिगुर विचि अम्रितु है हरि उतमु हरि पदु सोइ ॥ नानक किरपा ते हरि धिआईऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥१॥*
समतु = एक जैसा। द्रिसटि = नजर। भावनी = श्रद्धा। सिधि = सफलता। हरि पदु = हरि के साथ मिलाप।1।
```सतिगुरु सब जीवों पर मेहर करने वाला है, उसके लिए हरेक जीव एक समान है। वह सब की ओर एक निगाह से देखता है, पर (जीव को अपने उद्यम की) सफलता अपने मन की भावना के कारण होती है (भाव, जैसी मन की भावना तैसी मुराद मिलती है)। सतिगुरु के पास हरि के श्रेष्ठ नाम का अमृत है। (पर) हे नानक! यही हरि-नाम, जीव (प्रभु की) कृपा से स्मरण करता है, सतिगुरु से सन्मुख हो के कोई (भाग्यशाली) ही हासिल कर सकता है।1।```
*मः ४ ॥ हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥ लाहा हरि धनु खटिआ गुरमुखि सबदु वीचारि ॥ हउमै मैलु बिखु उतरै हरि अम्रितु हरि उर धारि ॥ सभि कारज तिन के सिधि हहि जिन गुरमुखि किरपा धारि ॥ नानक जो धुरि मिले से मिलि रहे हरि मेले सिरजणहारि ॥२॥*
बिखु = जहिर। उर = हृदय। सिध = सफल (सिधि = सफलता)। सिरजणहारि = विधाता ने।2।
```माया से उपजा हुआ अहंकार बिलकुल जहर (का काम करता) है, इसके पीछे लगने से सदा जगत में घाटा है। प्रभु के नाम धन का लाभ सतिगुरु के सन्मुख रहके शब्द के विचार के द्वारा कमाया (जा सकता है), और अहंकार की मैल (रूपी) जहर, प्रभु का अमृत नाम हृदय में धारन करने से उतर जाती है। (ये नाम की दाति प्रभु के हाथ में है), जिस गुरमुखों पर वह कृपा करता है, उनके सारे काम सफल हो जाते हैं। (उन्हें मानव जनम के असल व्यापार में घाटा नहीं पड़ता), (पर) हे नानक! प्रभु को वही मिले हैं, जो दरगाह से मिले हैं, और जिन्हें विधाता हरि ने स्वयं मिलाया है।2।```