*Guruvaani - 293*
*साधसंगि मिलि करहु अनंद ॥ गुन गावहु प्रभ परमानंद ॥ राम नाम ततु करहु बीचारु ॥ द्रुलभ देह का करहु उधारु ॥ अम्रित बचन हरि के गुन गाउ ॥ प्रान तरन का इहै सुआउ ॥ आठ पहर प्रभ पेखहु नेरा ॥ मिटै अगिआनु बिनसै अंधेरा ॥ सुनि उपदेसु हिरदै बसावहु ॥ मन इछे नानक फल पावहु ॥५॥*
अनंद = खुशियां। प्रभ गुन = प्रभु के गुण। परमानंद = सबसे ऊँची खुशी वाला। उधारु = बचाव। सुआउ = साधन, ढंग। तरन = बचाना।5।
```परम खुशियों वाले प्रभु की महिमा करो, सत्संग में मिल के ये (आत्मिक) आनंद लो।```
```प्रभु के नाम के भेद को विचारो और इस (मनुष्य-) शरीर का बचाव करो जो बड़ी मुश्किल से मिलता है।```
```अकाल-पुरख के गुण गाओ जो अमर करने वाले वचन हैं, जिंदगी को (विकारों से) बचाने का यही तरीका है।```
```आठों पहर प्रभु को अपने अंग-संग देखो (इस तरह) अज्ञानता मिट जाएगी और (माया वाला) अंधेरा नाश हो जाएगा।```
```हे नानक! (सतिगुरु का) उपदेश सुन के हृदय में बसाओ (इस तरह) मन-मांगी मुरादें मिलेंगीं।5।```
*हलतु पलतु दुइ लेहु सवारि ॥ राम नामु अंतरि उरि धारि ॥ पूरे गुर की पूरी दीखिआ ॥ जिसु मनि बसै तिसु साचु परीखिआ ॥ मनि तनि नामु जपहु लिव लाइ ॥ दूखु दरदु मन ते भउ जाइ ॥ सचु वापारु करहु वापारी ॥ दरगह निबहै खेप तुमारी ॥ एका टेक रखहु मन माहि ॥ नानक बहुरि न आवहि जाहि ॥६॥*
हलतु = (सं: अत्र) ये लोक। पलतु = (सं: परत्र) परलोक। उरि धारि = हृदय में टिकाओ। दीखिआ = शिक्षा। जिसु मनि = जिस (मनुष्य) के मन में। तिसु = उसे। परीखिआ = परख, समझ। वापारी = हे बंजारे जीव! निबहै = सफल हो जाए, निभ जाए। खेप = सौदा। बहुरि = फिर, दुबारा। साचु = सदा सिथर रहने वाला प्रभु।6।
```प्रभु का नाम अंदर हृदय में टिकाओ, (इस तरह) लोक और परलोक दोनों सुधार लो।```
```पूरे सतिगुरु की शिक्षा भी पूर्ण (भाव, संपूर्ण, मुकम्मल) होती है, जिस मनुष्य के मन में (ये शिक्षा) बसती है उसको सदा स्थिर रहने वाला प्रभु समझ जाता है।```
```मन और शरीर के द्वारा ध्यान जोड़ के नाम जपो, दुख-दर्द और मन से डर दूर हो जाएगा।```
```हे बंजारे जीव! सच्चा वणज करो, (नाम रूपी सच्चे व्यापार से) तुम्हारा सौदा प्रभु की दरगाह में बिक जाएगा।```
```हे नानक! मन में एक अकाल-पुरख का आसरा रखो, बार-बार जनम-मरन का चक्कर नहीं रहेगा।6।```
*तिस ते दूरि कहा को जाइ ॥ उबरै राखनहारु धिआइ ॥ निरभउ जपै सगल भउ मिटै ॥ प्रभ किरपा ते प्राणी छुटै ॥ जिसु प्रभु राखै तिसु नाही दूख ॥ नामु जपत मनि होवत सूख ॥ चिंता जाइ मिटै अहंकारु ॥ तिसु जन कउ कोइ न पहुचनहारु ॥ सिर ऊपरि ठाढा गुरु सूरा ॥ नानक ता के कारज पूरा ॥७॥*
तिस ते = उस प्रभु से। कहा = कहाँ? उबरै = बचता है। न पहुँचनहारु = बराबरी नहीं कर सकता। ठाढा = खड़ा। सूरा = सुरमा, शूरवीर। ता कै = उसके अंदर।7।
```उस प्रभु से परे कहाँ कोई जीव जा सकता है? जीव बचता ही राखनहार प्रभु को स्मरण करके है।```
```जो मनुष्य निरभउ अकाल-पुरख को जपता है, उसका डर मिट जाता है, (क्योंकि) प्रभु की मेहर से ही बंदा (डर से) निजात पाता है।```
```जिस बंदे की प्रभु रक्षा करता है, उसे कोई दुख नहीं छूता, नाम जपने से मन में सुख पैदा होता है।```
```(नाम स्मरण करने से) चिन्ता दूर हो जाती है, अहंकार मिट जाता है, उस मनुष्य की कोई बराबरी ही नहीं कर सकता।```
```हे नानक! जिस आदमी के सिर पर सूरमा सतिगुरु (रक्षक बन के) खड़ा हुआ है, उसके सारे काम रास आ जाते हैं।7।```
*मति पूरी अम्रितु जा की द्रिसटि ॥ दरसनु पेखत उधरत स्रिसटि ॥ चरन कमल जा के अनूप ॥ सफल दरसनु सुंदर हरि रूप ॥ धंनु सेवा सेवकु परवानु ॥ अंतरजामी पुरखु प्रधानु ॥ जिसु मनि बसै सु होत निहालु ॥ ता कै निकटि न आवत कालु ॥ अमर भए अमरा पदु पाइआ ॥ साधसंगि नानक हरि धिआइआ ॥८॥२२॥*
जा की द्रिसटि = जिसकी नजर में। दरसनु पेखत = दीदार करके। अनूप = लासानी, बेमिसाल, अति सुंदर। सफल दरसनु = जिसका दीदार मुरादें पूरी करने वाला है। धंनु = मुबारक। परवानु = स्वीकार। प्रधानु = सब से बड़ा। ता कै निकटि = उसके नजदीक। अमरा पदु = सदा कायम रहने वाला दर्जा।8।
```जिस प्रभु की समझ पूरन (infallible, अचूक) है, जिसकी नजर में से अमृत बरसता है, उसका दीदार करने से जगत का उद्धार होता है।```
```जिस प्रभु के कमलों (जैसे) अति सुंदर चरण हैं, उसका रूप सुंदर है, और, उसका दीदार मुरादें पूरी करने वाला है।```
```वह अकाल-पुरख घट घट की जानने वाला और सबसे बड़ा है, उसका सेवक (दरगाह में) स्वीकार हो जाता है (तभी तो) उसकी सेवा मुबारक है।```
```जिस मनुष्य के हृदय में (ऐसा प्रभु) बसता है वह (फूल जैसा) खिलता है, उसके नजदीक काल (भी) नहीं आता (भाव, मौत का डर उसे छूता नहीं)।```
```हे नानक! जिस मनुष्यों ने सत्संग में प्रभु को स्मरण किया है, वे जनम मरण से रहित हो जाते हैं, और सदा कायम रहने वाला दरजा हासिल कर लेते हैं।8।22।```
*सलोकु ॥ गिआन अंजनु गुरि दीआ अगिआन अंधेर बिनासु ॥ हरि किरपा ते संत भेटिआ नानक मनि परगासु ॥१॥*
अंजनु = सुरमा। गुरि = गुरु ने। अंधेर बिनासु = अंधेरे का नाश। संत भेटिआ = गुरु को मिला। मनि = मन में। परगासु = प्रकाश।1।
```(जिस मनुष्य को) सतिगुरु ने ज्ञान का सुरमा बख्शा है, उसके अज्ञान (रूपी) अंधेरे का नाश हो जाता है।```
```हे नानक! (जो मनुष्य) अकाल-पुरख की मेहर से गुरु को मिला है, उसके मन में (ज्ञान का) प्रकाश हो जाता है।1।```
*असटपदी ॥ संतसंगि अंतरि प्रभु डीठा ॥ नामु प्रभू का लागा मीठा ॥ सगल समिग्री एकसु घट माहि ॥ अनिक रंग नाना द्रिसटाहि ॥ नउ निधि अम्रितु प्रभ का नामु ॥ देही महि इस का बिस्रामु ॥ सुंन समाधि अनहत तह नाद ॥ कहनु न जाई अचरज बिसमाद ॥ तिनि देखिआ जिसु आपि दिखाए ॥ नानक तिसु जन सोझी पाए ॥१॥*
अंतरि = (अपने) अंदर। नाना = कई किस्म के। द्रिसटाहि = देखने में आते हैं। समग्री = पदार्थ। एकसु = एक ही। घट माहि = घट में। एकसु घट माहि = एक (प्रभु) में ही! बिस्रामु = ठिकाना। सुंन समाधि = वह समाधि जिसमें कोई विचार ना उठे। अनहद = एक रस, लगातार। तह = वहाँ, उस शरीर में। नाद = आवाज, राग। बिसमाद = आश्चर्य।1।
```(जिस मनुष्य ने) गुरु की संगति में (रह के) अपने अंदर अकाल-पुरख को देखा है, उसे प्रभु का नाम प्यारा लग जाता है।```
```(जगत के) सारे पदार्थ (उसे) एक प्रभु में ही (लीन दिखते हैं), (उस प्रभु से ही) अनेक किस्मों के रंग तमाशे (निकले हुए) दिखते हैं```
```(उस मनुष्य के) शरीर में प्रभु के उस नाम का ठिकाना (हो जाता है) जो (मानो, जगत के) नौ ही खजानों (के बराबर) है और अमृत है।```
```उस मनुष्य के अंदर शून्य-समाधि की अवस्था (निरंतर-निर्विघ्न तवज्जो) बना रहती है, और, ऐसा आश्चर्य एक-रस राग (-रूपी आनंद बना रहता है) जिसका बयान नहीं हो सकता।```
```(पर) हे नानक! ये (आनंद) उस मनुष्य ने देखा है जिसे प्रभु खुद दिखाता है (क्योंकि) उस मनुष्य को (उस आनंद की) समझ देता है।1।```