*Guruvaani - 291*
*जब होवत प्रभ केवल धनी ॥ तब बंध मुकति कहु किस कउ गनी ॥ जब एकहि हरि अगम अपार ॥ तब नरक सुरग कहु कउन अउतार ॥ जब निरगुन प्रभ सहज सुभाइ ॥ तब सिव सकति कहहु कितु ठाइ ॥ जब आपहि आपि अपनी जोति धरै ॥ तब कवन निडरु कवन कत डरै ॥ आपन चलित आपि करनैहार ॥ नानक ठाकुर अगम अपार ॥२॥*
धनी = मालिक। बंध = (माया के) बंधन। मुकति = माया से मुक्ति। गनी = समझें। अगम = जिस तक पहुँच ना हो सके। अपार = बेअंत। अउतार = जनम लेने वाले। सिव = जीवात्मा। सकति = माया। कितु ठाइ = क्हाँ? चलित = तमाशे।2।
```जब मालिक प्रभु सिर्फ (स्वयं ही) था, तब बताओ, किसे बंधनों में फंसा हुआ, और किसे मुक्त समझें?```
```जब अगम और बेअंत प्रभु एक खुद ही था, तब बताओ, नर्कों और स्वर्गों में आने वाले कौन से जीव थे?```
```जब सहज स्वभाव ही प्रभु निर्गुण था (त्रिगुणी माया से परे था), (भाव, जब उसने माया रची ही नहीं थी) तब बताओ, कहाँ थे जीव और कहाँ थी माया?```
```जब प्रभु खुद ही अपनी ज्योति जगाए बैठा था, तब कौन निडर थे और कौन किससे डरते थे?```
```हे नानक! अकाल-पुरख अगम और बेअंत है; अपने तमाश आप ही करने वाला है।2।```
*अबिनासी सुख आपन आसन ॥ तह जनम मरन कहु कहा बिनासन ॥ जब पूरन करता प्रभु सोइ ॥ तब जम की त्रास कहहु किसु होइ ॥ जब अबिगत अगोचर प्रभ एका ॥ तब चित्र गुपत किसु पूछत लेखा ॥ जब नाथ निरंजन अगोचर अगाधे ॥ तब कउन छुटे कउन बंधन बाधे ॥ आपन आप आप ही अचरजा ॥ नानक आपन रूप आप ही उपरजा ॥३॥*
आसन = तख्त, स्वरूप। तह = वहाँ। त्रास = डर। जम = (सं: यम) मौत। अबिगत = (सं: अव्यक्त) अदृष्य प्रभु। अगोचर = जिस तक शारीरिक इंद्रियों की पहुँच ना हो सके। चित्र गुपत = जीवों के किए कर्मों का लेखा पूछने वाले। अगाध = अथाह। अचरजा = हैरान करने वाला। उपरजा = पैदा किया है।3।
```जब अकाल-पुरख अपनी मौज में अपने ही स्वरूप में टिका बैठा था, तब बताओ, पैदा होना, मरना व मौत कहाँ थी?```
```जब कर्तार पूरन प्रभु खुद ही था, तब बताओ, मौत का डर किस को हो सकता था?```
```जब अदृष्य और अगोचर प्रभु एक खुद ही था, तब चित्रगुप्त किससे लेखा पूछ सकते थे?```
```जब मालिक माया-रहित अथाह अगोचर स्वयं ही था, तो कौन माया के बंधनों से मुक्त था और कौन माया के बंधनों में बंधे हुए हैं?```
```वह आश्चर्य जनक प्रभु अपने जैसा खुद ही है। हे नानक! अपना आकार उसने स्वयं ही पैदा किया है।3।```
*जह निरमल पुरखु पुरख पति होता ॥ तह बिनु मैलु कहहु किआ धोता ॥ जह निरंजन निरंकार निरबान ॥ तह कउन कउ मान कउन अभिमान ॥ जह सरूप केवल जगदीस ॥ तह छल छिद्र लगत कहु कीस ॥ जह जोति सरूपी जोति संगि समावै ॥ तह किसहि भूख कवनु त्रिपतावै ॥ करन करावन करनैहारु ॥ नानक करते का नाहि सुमारु ॥४॥*
पुरखु = अकाल-पुरख। पुरखपति = पुरखों का पति, जीवों का मालिक। निरबान = वासना रहित। जगदीस = जगत की (ईश) मालिक। छल = धोखा। छिद्र = एब। कीस = किस को? त्रिपतावै = तृप्त होता है। सुमारु = अंदाजा।4।
```जिस अवस्था में जीवों का मालिक निर्मल प्रभु स्वयं ही था वहाँ वह मैल-रहित था, तो बताओ, उसने कौन सी मैल धोनी थी?```
```जहाँ माया रहित, आकार रहित और वासना रहित प्रभु ही था, वहाँ गुमान-अहंकार किसे होना था?```
```जहाँ केवल जगत के मालिक प्रभु की ही हस्ती थी, वहाँ बताएं, छल और ऐब किसे लग सकते थे?```
```जब ज्योति-रूप प्रभु खुद ही ज्योति में लीन था, तब किसे (माया की) भूख हो सकती थी और कौन तृप्त था?```
```कर्तार खुद ही सब कुछ करने वाला और जीवों से कराने वाला है। हे नानक! कर्तार का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।4।```
*जब अपनी सोभा आपन संगि बनाई ॥ तब कवन माइ बाप मित्र सुत भाई ॥ जह सरब कला आपहि परबीन ॥ तह बेद कतेब कहा कोऊ चीन ॥ जब आपन आपु आपि उरि धारै ॥ तउ सगन अपसगन कहा बीचारै ॥ जह आपन ऊच आपन आपि नेरा ॥ तह कउन ठाकुरु कउनु कहीऐ चेरा ॥ बिसमन बिसम रहे बिसमाद ॥ नानक अपनी गति जानहु आपि ॥५॥*
सुत = पुत्र। भाई = भ्राता। कला = ताकत। परबीन = प्रवीण, समझदार। चीन्ह = जानता, पहिचानता। आपन आपु = अपने आप को। उरिधारै = हृदय में टिकाता है। ठाकुरु = मालिक। चेरा = सेवक। कहा बीचारै = कहाँ कोई विचारता है? बिसमन बिसम = आश्चर्य से आश्चर्यजनक।5।
```जब प्रभु ने अपनी शोभा अपने साथ बनाई थी (भाव, जब कोई और उसकी शोभा करने वाला नहीं था) तो कौन माँ, पिता, मित्र, पुत्र अथवा भाई थे?```
```जब अकाल पुरख स्वयं ही सारी ताकतों में प्रवीण था, तब कहाँ कोई वेद (हिंदू धर्म पुस्तक) और कतेबों को (मुसलमानों की धर्म पुस्तकें) विचारता था?```
```जब प्रभु अपने आप को खुद ही अपने आप में टिकाए बैठा था, अच्छे-बुरे शगुन (अपशगुन) कौन सोचता था? बताएं, मालिक कौन था और सेवक कौन था?```
```हे नानक! (प्रभु के आगे अरदास कर और कह: हे प्रभु!) तू अपनी गति आप ही जानता है, जीव तेरी गति तलाशते हुए हैरान और आश्चर्यचकित हो रहे हैं।5।```
*जह अछल अछेद अभेद समाइआ ॥ ऊहा किसहि बिआपत माइआ ॥ आपस कउ आपहि आदेसु ॥ तिहु गुण का नाही परवेसु ॥ जह एकहि एक एक भगवंता ॥ तह कउनु अचिंतु किसु लागै चिंता ॥ जह आपन आपु आपि पतीआरा ॥ तह कउनु कथै कउनु सुननैहारा ॥ बहु बेअंत ऊच ते ऊचा ॥ नानक आपस कउ आपहि पहूचा ॥६॥*
अछल = जो छला ना जा सके, जिसे धोखा ना दिया जा सके। अछेद = जो छेदा ना जा सके। अभेद = जिसका भेद ना पाया जा सके। ऊहा = वहाँ। किसहि = कसको? आपस कउ = अपने आप को। आपहि = स्वयं ही। आदेसु = नमस्कार, प्रणाम। परवेसु = दखल, प्रभाव। अचिंतु = बेफिक्र। आपन आपु = अपने आप को। पतीआरा = पतिआने वाला। पहूचा = पहुँचा हुआ है।6।
```जिस अवस्था में अछल-अबिनाशी और अभेद प्रभु (अपने आप में) टिका हुआ है, वहाँ किसे माया छू सकती है?```
```(जब) प्रभु अपने आप को ही नमस्कार करता है, (माया के) तीन गुणों का (उस पर) असर नहीं पड़ता।```
```जब भगवान केवल एक खुद ही था, तब कौन बेफिक्र था और किसको कोई चिन्ता लगती थी।```
```जब अपने आप को पतियाने वाला प्रभु स्वयं ही था,तब कौन बोलता था और कौन सुनने वाला था?```
```हे नानक! प्रभु बड़ा बेअंत है, सबसे ऊँचा है, अपने आप तक आप ही पहुँचने वाला है।6।```