*Guruvaani - 284*
*मनसा पूरन सरना जोग ॥ जो करि पाइआ सोई होगु ॥ हरन भरन जा का नेत्र फोरु ॥ तिस का मंत्रु न जानै होरु ॥ अनद रूप मंगल सद जा कै ॥ सरब थोक सुनीअहि घरि ता कै ॥ राज महि राजु जोग महि जोगी ॥ तप महि तपीसरु ग्रिहसत महि भोगी ॥ धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ ॥ नानक तिसु पुरख का किनै अंतु न पाइआ ॥२॥*
मनसा = मन का फुरना, ख्वाइश। सरना जोग = शरण देने के काबिल, शरण आए की सहायता करने के काबिल। करि = हाथ पर, जीव के हाथ पर। पाइआ = डाल दिया है, लिख दिया है। होगु = होगा। नेत्र फोरु = आँख का फरकना। हरन = नाश करना। भरन = पालना। मंत्र = गहरा भेद। मंगल = खुशियां। सुनीअहि = सुने जाते हैं। तपीसुर = बड़ा तपस्वी। भोगी = भोगने वाला, गृहस्थी।2।
```प्रभु (जीवों के) मन के फुरने पूरे करने व शरण आए की सहायता करने के समर्थ है। जो उसने (जीवों के) हाथों में लिख दिया है, वही होता है।```
```जिस प्रभु का आँख फरकने का समय (जगत के) पालने और नाश करने के लिए (काफी) है, उसका छुपा हुआ भेद कोई और जीव नहीं जानता।```
```जिस प्रभु के घर में सदा आनंद और खुशियां हैं, (जगत के) सारे पदार्थ उसके घर में (मौजूद) सुने जाते हैं।```
```राजाओं में प्रभु खुद ही राजा है, जोगियों में जोगी है, तपस्वियों में स्वयं ही बड़ा तपस्वी है और गृहस्तियों में भी सवयं ही गृहस्थी है।```
```भक्त जनों ने (उस प्रभु को) स्मरण कर-कर के सुख पा लिया है। हे नानक! किसी जीव ने उस अकाल-पुरख का अंत नहीं पाया।2।```
*जा की लीला की मिति नाहि ॥ सगल देव हारे अवगाहि ॥ पिता का जनमु कि जानै पूतु ॥ सगल परोई अपुनै सूति ॥ सुमति गिआनु धिआनु जिन देइ ॥ जन दास नामु धिआवहि सेइ ॥ तिहु गुण महि जा कउ भरमाए ॥ जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥ ऊच नीच तिस के असथान ॥ जैसा जनावै तैसा नानक जान ॥३॥*
लीला = (जगत रूपी) खेल। मिति = गिनती, अंदाजा। अवगाहि = गोता लगा के, खोज खोज के। सगल = सारी (सृष्टि)। सूति = सूत्र में, धागे में (जैसे माला के मणके)। गिआनु = ऊँची समझ। धिआनु = (प्रभु चरणों में) तवज्जो जोड़नी। जिन देइ = जिन्हें देता है। सेइ = वह ही। भरमाए = भटकाता है। ऊच असथान = सुमति ज्ञान ध्यान वाले जीव। नीच असथान = तीन गुणों में भटकने वाले जीव। जनावै = समझ देता है।3।
```जिस प्रभु की (जगत रूपी) खेल का लेखा कोई नहीं लगा सकता, उसे खोज-खोज के सारे देवते भी थक गए हैं।```
```(क्योंकि) पिता का जन्म पुत्र क्या जाने? (जैसे माला के मणके) धागे में परोए हुए होते हैं, (वैसे ही) सारी रचना प्रभु ने अपने (हुक्म रूपी) धागे में परोई हुई है।```
```जिस लोगों को प्रभु सुमति, ऊँची समझ और तवज्जो जोड़ने की दाति देता है, वही सेवक और दास उसका नाम स्मरण करते हैं।```
```(पर) जिनको (माया के) तीन गुणों में भटकाता है, वह पैदा होते मरते रहते हैं और बार बार (जगत में) आते और जाते रहते हैं।```
```सुमति वाले ऊँचे लोगों के हृदय त्रिगुणी नीच लोगों के मन- ये सारे उस प्रभु के अपने ही ठिकाने हैं (भाव, सब में बसता है)। हे नानक! जैसी बुद्धि-मति देता है, वैसी ही समझ वाला जीव बन जाता है।3।```
*नाना रूप नाना जा के रंग ॥ नाना भेख करहि इक रंग ॥ नाना बिधि कीनो बिसथारु ॥ प्रभु अबिनासी एकंकारु ॥ नाना चलित करे खिन माहि ॥ पूरि रहिओ पूरनु सभ ठाइ ॥ नाना बिधि करि बनत बनाई ॥ अपनी कीमति आपे पाई ॥ सभ घट तिस के सभ तिस के ठाउ ॥ जपि जपि जीवै नानक हरि नाउ ॥४॥*
नाना = कई किस्म के। इक रंग = एक ही किस्म का, एक रंग वालां। करहि = तू करता है। नाना बिधि = कई तरीकों से। चलित = चमत्कार, तमाशे।4।
```हे प्रभु! तू, जिस के कई रूप और रंग हैं, कई वेष धारण करता है (और फिर भी) एक ही तरह का है।```
```प्रभु नाश-रहित है, और सब जगह एक खुद ही खुद है, उसने जगत का पसारा कई तरीकों से किया है।```
```कई तमाशे प्रभु पलक में कर देता है, वह पूरन पुरख सब जगह व्यापक है।```
```जगत की रचना प्रभु ने कई तरीकों से रची है, अपनी (महिमा का) मूल्य वह खुद ही जानता है।```
```सारे शरीर उस प्रभु के ही हैं, सारी जगहें उसी की ही हैं। हे नानक! (उस का दास) उस का नाम जप-जप के जीता है।4।```
*नाम के धारे सगले जंत ॥ नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥ नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ॥ नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥ नाम के धारे आगास पाताल ॥ नाम के धारे सगल आकार ॥ नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ॥ नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥ करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए ॥ नानक चउथे पद महि सो जनु गति पाए ॥५॥*
नाम = अकाल-पुरख। धारे = टिकाए हुए, आसरे। ब्रहमंड = (सं: ब्रह्मांड = The egg of Brahman, the primordial egg from which the universe sprang, the world, universe) सृष्टि, जगत। खंड = हिस्से, टुकड़े। आगास = आकाश। आकार = स्वरूप,शरीर। पुरीआ = शहर, शरीर, 14 लोक। भवन = (सं: भुवन = A world, the number of world is either three, as in त्रिभुवन, or fourteen) लोक, जगत। स्रवन = कानों से। चउथे पद महि = माया के तीन गुणों को लांघ के ऊपरी सतह पर, माया के असर से ऊपर की अवस्था।5।
```सारे जीव-जंतु अकाल-पुरख के आसरे हैं, जगत के सारे (हिस्से) भी प्रभु के टिकाए हुए हैं।```
```वेद, पुराण, स्मृतियां प्रभु के आधार पर हैं, ज्ञान की बातें सुननी और तवज्जो जोड़नी भी अकाल-पुरख के आसरे ही हैं।```
```सारे आकाश-पाताल प्रभु-आसरे हैं, सारे शरीर ही प्रभु के आधार पर हैं।```
```तीनों भवन और चौदह लोक अकाल-पुरख के टिकाए हुए हैं, जीव प्रभु में जुड़ के और उसका नाम कानों से सुन के विकारों से बचते हैं।```
```जिस को मेहर करके अपने नाम में जोड़ता है, हे नानक! वह मनुष्य (माया के असर से ऊपर) चौथे तल पर पहुँच कर उच्च अवस्था प्राप्त करता है।5।```
*रूपु सति जा का सति असथानु ॥ पुरखु सति केवल परधानु ॥ करतूति सति सति जा की बाणी ॥ सति पुरख सभ माहि समाणी ॥ सति करमु जा की रचना सति ॥ मूलु सति सति उतपति ॥ सति करणी निरमल निरमली ॥ जिसहि बुझाए तिसहि सभ भली ॥ सति नामु प्रभ का सुखदाई ॥ बिस्वासु सति नानक गुर ते पाई ॥६॥*
सति = 1.सदा स्थिर रहने वाला, 2.संपूर्ण, मुकम्मल, जो अधूरा नहीं, ना खोए जाने वाला, अटल। परधानु = जाना माना, सब के सिर पर। करतूति = काम। उतपति = पैदायश, रचना। निरमल निरमली = निर्मल से निर्मल, महा पवित्र। भली = सुखदाई। बिस्वास = विश्वास, श्रद्धा। करमु = बख्शिश। करणी = काम, रजा।6।
```जिस प्रभु का रूप और ठिकाना सदा स्थिर रहने वाले हैं, केवल वही सर्व-व्यापक प्रभु सब के सिर पर है।```
```जिस सदा अटल अकाल-पुरख की वाणी सब जीवों में रमी हुई है (भाव, जो प्रभु सब जीवों में बोल रहा है) उसके काम भी अटल हैं।```
```जिस प्रभु की रचना सम्पूर्ण है (भाव, अधूरा नहीं), जो (सबका) मूल (रूप) सदा स्थिर है, जिसका पैदा होना भी संपूर्ण है, उसकी बख्शिश सदा कायम है।```
```प्रभु की महा पवित्र रजा है, जिस जीव को (रजा की) समझ देता है, उस को (वह रजा) पूरन तौर पर सुखदाई (लगती है)।```
```प्रभु का सदा स्थिर रहने वाला नाम सुख दाता है। हे नानक! (जीव को) ये अटल सिदक सतिगुरु से मिलता है।6।```
*सति बचन साधू उपदेस ॥ सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥ सति निरति बूझै जे कोइ ॥ नामु जपत ता की गति होइ ॥ आपि सति कीआ सभु सति ॥ आपे जानै अपनी मिति गति ॥ जिस की स्रिसटि सु करणैहारु ॥ अवर न बूझि करत बीचारु ॥ करते की मिति न जानै कीआ ॥ नानक जो तिसु भावै सो वरतीआ ॥७॥*
निरति = (सं: निरति strong attachment, fondness, devotion) प्यार। मिति = गिनती, अंदाजा। गति = पहुँच, अवस्था। कीआ = पैदा किया हुआ जीव। वरतीआ = वरतता है, विद्यमान है।7।
```गुरु के उपदेश अटल वचन हैं, जिनके हृदय में (इस उपदेश का) प्रवेश होता है, वह भी अटल (भाव, जनम-मरन से रहित) हो जाते हैं।```
```अगर किसी मनुष्य को सदा स्थिर रहने वाले प्रभु के प्यार की सूझ आ जाए, तो नाम जप के वह उच्च अवस्था हासिल कर लेता है।```
```प्रभु खुद सदा कायम रहने वाला है, उसका पैदा किया हुआ जगत भी सच-मुच अस्तित्व वाला है (भाव, मिथ्या नहीं है) प्रभु अपनी अवस्था और मर्यादा स्वयं ही जानता है।```
```जिस प्रभु का ये जगत है वह खुद इसे बनाने वाला है, किसी और को इस जगत का ख्याल रखने वाला (भी) ना समझो।```
```कर्तार (की प्रतिभा) का अंदाजा उसका पैदा किया हुआ आदमी नहीं लगा सकता। हे नानक! वही कुछ होता है जो उस प्रभु को भाता है।7।```