*Guruvaani - 274*
*सलोकु ॥ उरि धारै जो अंतरि नामु ॥ सरब मै पेखै भगवानु ॥ निमख निमख ठाकुर नमसकारै ॥ नानक ओहु अपरसु सगल निसतारै ॥१॥*
उरि = हृदय में। अंतरि = अंदर, मन में। धारै = टिकाए। मै = (सं: ‘मय’) ‘मै’ व्याकरण का एक ‘पिछेक्तर’ है, जिसका भाव है ‘मिला हुआ, भरा हुआ, व्यापक’। सरब मै = सभी में व्यापक। निमख = आँख की फड़कना। अपरसु = अछोह (सं: अस्पर्श) जो किसी के साथ ना छूए।1।
```जो मनुष्य सदा अपने हृदय में अकाल-पुरख का नाम टिकाए रखता है, और भगवान को सभी में व्यापक देखता है, जो पल पल अपने प्रभु को नमस्कार करता है; हे नानक! वह (असली) अछोह है और वह सब जीवों को (संसार समुंदर से) तार लेता है।1।```
*असटपदी ॥ मिथिआ नाही रसना परस ॥ मन महि प्रीति निरंजन दरस ॥ पर त्रिअ रूपु न पेखै नेत्र ॥ साध की टहल संतसंगि हेत ॥ करन न सुनै काहू की निंदा ॥ सभ ते जानै आपस कउ मंदा ॥ गुर प्रसादि बिखिआ परहरै ॥ मन की बासना मन ते टरै ॥ इंद्री जित पंच दोख ते रहत ॥ नानक कोटि मधे को ऐसा अपरस ॥१॥*
मिथिआ = झूठ। परस = छोह। प्रीति निरंजन दरस = अंजन (कालिख-) रहित प्रभु के दर्शन की प्रीति। त्रिअ रूपु = स्त्री का रूप। हेत = प्यार। करन = कानों से। काहू की = किसी की भी। बिखिआ = माइआ। परहरै = त्याग दे। बासना = वासना, फुरना। टरै = टल जाए। इंद्री जित = इंन्द्रियों को जीतने वाला। दोख = विकार। पंच दोख = काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारं। कोटि = करोड़। मधे = में। को = कोई विरला।1।
```जो मनुष्य जीभ से झूठ को छूने नहीं देता, मन में अकाल-पुरख के दीदार की तमन्ना रखता है;```
```जो पराई स्त्री के हुस्न को अपनी आँखों से नहीं देखता, भले मनुष्यों की टहल (सेवा करता है) और संत जनों की संगति में प्रीति (रखता है);```
```जो कानों से किसी की भी निंदा नहीं सुनता, (बल्कि) सभी से अपने आप को बुरा समझता है;```
```जो गुरु की मेहर के सदका माइआ (का प्रभाव) परे हटा देता है, और जिसके मन की वासना मन से टल जाती है;```
```जो अपनी ज्ञान-इंद्रिय को वश में रख के कामादिक पाँचों विकारों से बचा रहता है, हे नानक! करोड़ों में से कोई ऐसा विरला मनुष्य ‘अपरस’ (कहा जा सकता है)।1।```
*बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसंन ॥ बिसन की माइआ ते होइ भिंन ॥ करम करत होवै निहकरम ॥ तिसु बैसनो का निरमल धरम ॥ काहू फल की इछा नही बाछै ॥ केवल भगति कीरतन संगि राचै ॥ मन तन अंतरि सिमरन गोपाल ॥ सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥ आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै ॥ नानक ओहु बैसनो परम गति पावै ॥२॥*
बैसनो = (संस्कृत: वैष्णव) विष्णु का पुजारी। बिसन = (सं. विष्णु, The second deity of the Sacred Hindu Triad, entrusted with the preservation of the world, which duty he is represented to have duly discharged by his various incarnations; The word is thus popularly derived; यस्माद्विश्वमिदं सर्वं तस्य शक्त्य: महात्मना॥ तस्मादेवोच्यते विष्णुर्विशधातो: प्रवेशनात्॥)।
जगत = पालक। निहकरम = कर्म रहित, किए हुए कर्मों के फलों की इच्छा ना रखता हुआ। बाछै = चाहता है। द्रिढै = पक्का करता है, अच्छी तरह मन में टिकाता है।2।
```जो मनुष्य प्रभु की माया के असर से बेदाग है, और, जिस पर प्रभु खुद प्रसन्न होता है, वह है असली वैष्णव।```
```उस वैष्णव का धर्म (भी) पवित्र है जो (धर्म के) काम करता हुआ इन कामों के फल की इच्छा नहीं रखता।```
```जो मनुष्य निरा भक्ति व कीर्तन में मस्त रहता है, और किसी भी फल की ख्वाइश नहीं करता;```
```जिसके मन तन में प्रभु का स्मरण बस रहा है, जो सब जीवों पे दया करता है,```
```जो खुद (प्रभु के नाम को) अपने मन में टिकाता है व और लोगों को नाम जपाता है, हे नानक! वह वैष्णव उच्च स्थान हासिल करता है।2।```
*भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥ सगल तिआगै दुसट का संगु ॥ मन ते बिनसै सगला भरमु ॥ करि पूजै सगल पारब्रहमु ॥ साधसंगि पापा मलु खोवै ॥ तिसु भगउती की मति ऊतम होवै ॥ भगवंत की टहल करै नित नीति ॥ मनु तनु अरपै बिसन परीति ॥ हरि के चरन हिरदै बसावै ॥ नानक ऐसा भगउती भगवंत कउ पावै ॥३॥*
भगउती = (सं: भगवत्) भगवान का उपासक, पवित्र आत्मा। करि सगल = हर जगह व्यापक जान के। अरपै = सदके करता है, अर्पण करता है।3।
```भगवान का (असली) उपासक (वह है जिसके हृदय में) भगवान की भक्ति का प्यार है और जो सब बुरे काम करने वालों का संग त्याग देता है।```
```जिसके मन में से हर तरह का वहम मिट जाता है, जो अकाल-पुरख को हर जगह मौजूद जान के पूजता है।```
```उस भगवती की मति उत्तम होती है, जो गुरमुखों की संगति में रह के पापों की मैल (मन से) दूर करता है।```
```जो नित्य भगवान का स्मरण करता है, जो प्रभु के प्यार में अपना मन व तन कुर्बान कर देता है;```
```जो प्रभु के चरण (सदा अपने) हृदय में बसाता है। हे नानक! ऐसा भगवती भगवान को पा लेता है।3।```
*सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥ राम नामु आतम महि सोधै ॥ राम नाम सारु रसु पीवै ॥ उसु पंडित कै उपदेसि जगु जीवै ॥ हरि की कथा हिरदै बसावै ॥ सो पंडितु फिरि जोनि न आवै ॥ बेद पुरान सिम्रिति बूझै मूल ॥ सूखम महि जानै असथूलु ॥ चहु वरना कउ दे उपदेसु ॥ नानक उसु पंडित कउ सदा अदेसु ॥४॥*
परबोधै = जगाता है। आतम महि = अपने आप में, अपनी आत्मा में। सोधै = पड़ताल करता है, जांचता है। सारु = श्रेष्ठ, अच्छा, मीठा। उपदेसि = उपदेश से। जीवै = जीता है, रूहानी जिंदगी हासिल करता है। मूल = आरम्भ। पुरान = व्यास ऋषि के लिखे हुई 18 धर्म पुस्तकें। सूखम = सूक्षम, अदृश्य। असथूल = स्थूल, दृष्टमान जगत, आँखों से दिखता संसार। अदेसु = प्रणाम, नमस्कार।4।
```(असली) पण्डित वह है जो अपने मन को शिक्षा देता है, और प्रभु के नाम को अपने मन में तलाशता है।```
```उस पण्डित के उपदेश से (सारा) संसार रूहानी जिंदगी हासिल करता है, जो प्रभु नाम का मीठा स्वाद चखता है।```
```वह पंडित दुबारा जनम (मरन) में नहीं आता, जो अकाल-पुरख (की महिमा) की बातें अपने हृदय में बसाता है।```
```जो वेद पुराण स्मृतियां (आदि सब धर्म-पुस्तकों) के मूल (प्रभु को) समझता है, जो यह जानता है कि ये सारा दृश्यमान संसार अदृश्य प्रभु के ही आसरे है।```
```जो (ब्राहमण,क्षत्रीय,वैश्य व शूद्र) चारों ही जातियों को शिक्षा देता है, हे नानक! (कह) उस पंडित के सामने हम सदा सिर निवाते हैं (नत्मस्तक होते हैं)।4।```
*बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥ चहु वरना महि जपै कोऊ नामु ॥ जो जो जपै तिस की गति होइ ॥ साधसंगि पावै जनु कोइ ॥ करि किरपा अंतरि उर धारै ॥ पसु प्रेत मुघद पाथर कउ तारै ॥ सरब रोग का अउखदु नामु ॥ कलिआण रूप मंगल गुण गाम ॥ काहू जुगति कितै न पाईऐ धरमि ॥ नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि ॥५॥*
बीज मंत्रु = (सब मंत्रों का) मूल मंत्र। को = का। अंतरि उर = उरि उंतरि, हृदय में। मुघध = मुगध, मूर्ख। प्रेत = (संस्कृत: प्रेत = 1.The departed spirit, the spirit before obsequial rites are performed, 2- A ghost, evil spirit) बुरी रूह। अउखदु = दवाई। कलिआण = सुख। मंगल = अच्छे भाग्य। गाम = गायन। काहू धरमि = किसी भी धर्म द्वारा, किसी भी धार्मिक रस्म रिवाज के करने से। धुरि = धुर से, ईश्वर की ओर से। करमि = मेहर अनुसार।5।
```(ब्राहमण,क्षत्रीय,वैश्य व शूद्र) चारों ही जातियों में से कोई भी मनुष्य (प्रभु का) नाम जप (के देख ले), नाम (और सब मंत्रों का) मूल मंत्र है और सब का ज्ञान (दाता) है।```
```जो जो मनुष्य नाम जपता है उसकी जिंदगी ऊँची हो जाती है, (पर) कोई विरला मनुष्य ही साधु-संगत में (रह के) (इसे) हासिल करता है।```
```पशु, बुरी रूह, मूर्ख, पत्थर (-दिल) (कोई भी हो सब) को (नाम) तार देता है (अगर प्रभु) मेहर करके (उसके) हृदय में (नाम) टिका दे।```
```प्रभु का नाम सारे रोगों की दवाई है, प्रभु के गुण गाने सौभाग्य व सुख का रूप है।```
```(पर ये नाम और) किसी ढंग से अथवा किसी धार्मिक रस्म-रिवाज के करने से नहीं मिलता; हे नानक! (ये नाम) उस मनुष्य को मिलता है जिस (के माथे पर) धुर से (प्रभु की) मेहर मुताबक लिखा जाता है।5।```