*Guruvaani - 263*

 

*प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥ प्रभ कै सिमरनि उधरे मूचा ॥ प्रभ कै सिमरनि त्रिसना बुझै ॥ प्रभ कै सिमरनि सभु किछु सुझै ॥ प्रभ कै सिमरनि नाही जम त्रासा ॥ प्रभ कै सिमरनि पूरन आसा ॥ प्रभ कै सिमरनि मन की मलु जाइ ॥ अम्रित नामु रिद माहि समाइ ॥ प्रभ जी बसहि साध की रसना ॥ नानक जन का दासनि दसना ॥४॥*

उधरे = (विकारों से) बच जाते हैं। मूचा = महान ऊँचा, बहुत सारे। त्रिसना = तृष्णा, (माया की) प्यास। सभु किछु = हरेक बात। त्रास = डर। जम त्रासा = जमों का डर। रिद माहि = हृदय में। समाइ = टिक जाता है। रसना = जीभ। जन का = जन का, साधूओं का। साध = गुरमुख। दासनि दासा = दासों का दास।4।

```प्रभु का स्मरण करना (और) सभी (कोशिशों) से बेहतर है; प्रभु का स्मरण करने से बहुत सारे (जीव) (विकारों से) बच जाते हैं।```
```प्रभु का स्मरण करने से (माया की) प्यास मिट जाती है, (क्योंकि माया के) हरेक (तेवर) की समझ पड़ जाती है।```
```प्रभु का स्मरण करने से जमों का डर खत्म हो जाता है, और, (जीव की) आस पूर्ण हो जाती है (भाव, आशाओं से मन तृप्त हो जाता है)।```
```प्रभु का स्मरण करने से मन की (विकारों की) मैल दूर हो जाती है, और मनुष्य के हृदय में (प्रभु का) अमर करने वाला नाम टिक जाता है।```
```प्रभु जी गुरमुख मनुष्यों की जीभ पर बसते हैं (भाव, साधु जन सदा प्रभु को जपते हैं)। (कह) हे नानक! (मैं) गुरमुखों के सेवकों का सेवक (बनूँ)।4।```

*प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥ प्रभ कउ सिमरहि से पतिवंते ॥ प्रभ कउ सिमरहि से जन परवान ॥ प्रभ कउ सिमरहि से पुरख प्रधान ॥ प्रभ कउ सिमरहि सि बेमुहताजे ॥ प्रभ कउ सिमरहि सि सरब के राजे ॥ प्रभ कउ सिमरहि से सुखवासी ॥ प्रभ कउ सिमरहि सदा अबिनासी ॥ सिमरन ते लागे जिन आपि दइआला ॥ नानक जन की मंगै रवाला ॥५॥*

सिमरहि = (जो) स्मरण करते हैं। से = वे मनुष्य। धनवंते = धन वाले, धनाढ। पतिवंते = इज्जत वाले। परवान = स्वीकार, जाने माने। पुरख = मनुष्य। प्रधान = श्रेष्ठ, अच्छे। सि = वे, वह मनुष्य। बेमुहताजे = बे मुथाज, बेपरवाह। अबिनासी = नाश रहित, जनम मरन से रहित। सिमरनि = स्मरण में। ते = वे मनुष्य। जिन = जिस पे। आपि = प्रभु खुद। जन = सेवक। रवाल = चरणों की धूल।5।

```जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं, वे धनवान हैं, और वे आदरणीय हैं।```
```जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं, वे जाने माने प्रसिद्ध हुए हें, और वे (सब मनुष्यों से) अच्छे हैं।```
```जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं, वे किसी के मुहताज नहीं हैं, वे (तो बल्कि) सब के बादशाह हैं।```
```जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं, वे सुखी बसते हैं और सदा के वास्ते जनम मरन से रहित हो जाते हैं।```
```(पर) प्रभु स्मरण में वही मनुष्य लगते हैं जिनपे प्रभु स्वयं मेहरबान (होता है); हे नानक! (कोई भाग्यशाली) इन गुरमुखों की चरण-धूल माँगता है।5।```

*प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन सद बलिहारी ॥ प्रभ कउ सिमरहि से मुख सुहावे ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन सूखि बिहावै ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन आतमु जीता ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन निरमल रीता ॥ प्रभ कउ सिमरहि तिन अनद घनेरे ॥ प्रभ कउ सिमरहि बसहि हरि नेरे ॥ संत क्रिपा ते अनदिनु जागि ॥ नानक सिमरनु पूरै भागि ॥६॥*

उपकार = भलाई, नेकी। उपकारी = भलाई करने वाला। परउपकारी = दूसरों के साथ भलाई करने वाले। तिन = उनसे। सद = सदा। बलिहारी = सदके, कुर्बान। सुहावे = सोहणे। तिन = उनकी। सूखि = सुख में। बिहावै = बीतती है। तिन = उन्होंने। आतमु = अपने आप को। तिन रीता = उनकी रीति। रीत = जिंदगी गुजारने का तरीका। निरमल = मल रहित, पवित्र। अनद = आनंद, खुशियां, सुख। घनेरे = बहुत। बसहि = बसते हैं। नेरे = नजदीक। अनदिनु = हर रोज, हर समय। जागि = जाग सकते हैं। नानक = हे नानक! पूरै भागि = पूरी किस्मत से।6।

```जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं, वे दूसरों के साथ भलाई करने वाले बन जाते हें, उनसे (मैं) सदा सदके हूँ।```
```जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं, उनके मुंह सुंदर (लगते) हैं, उनकी (उम्र) सुख में गुजरती है।```
```जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं, वे अपने आप को जीत लेते हैं और उनका जिंदगी गुजारने का तरीका पवित्र हो जाता है।```
```जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं, उन्हें खुशियां ही खुशियां हैं, (क्योंकि) वे प्रभु की हजूरी में बसते हैं।```
```संतों की कृपा से ही ये हर समय (स्मरण की) जाग आ सकती है; हे नानक! स्मरण (की दाति) बड़ी किस्मत से (मिलती है)।6।```

*प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥ प्रभ कै सिमरनि कबहु न झूरे ॥ प्रभ कै सिमरनि हरि गुन बानी ॥ प्रभ कै सिमरनि सहजि समानी ॥ प्रभ कै सिमरनि निहचल आसनु ॥ प्रभ कै सिमरनि कमल बिगासनु ॥ प्रभ कै सिमरनि अनहद झुनकार ॥ सुखु प्रभ सिमरन का अंतु न पार ॥ सिमरहि से जन जिन कउ प्रभ मइआ ॥ नानक तिन जन सरनी पइआ ॥७॥*

झूरे = झुरता, चिन्ता करता। हरि गुन बानी = हरि के गुणों वाली वाणी। सहजि = सहज में, अडोल अवस्था में। समानी = लीन हो जाता है। निहचल = ना हिलने वाला, टिका हुआ। कमल = हृदय रूपी कमल फूल। बिगासनु = खिलाव। अनहद = एक रस, लगातार। झुनकार = रसीली मीठी आवाज। मइआ = मेहर, दया।7।

```प्रभु का स्मरण करने से मनुष्य के (सारे) काम पूरे हो जाते हैं (वह आवश्यक्ताओं के अधीन नहीं रहता) और कभी चिंताओं के वश नहीं पड़ता।```
```प्रभु का स्मरण करने से मनुष्य अकाल पुरख के गुण ही उच्चारता है (भाव, उसे महिमा की आदत पड़ जाती है) और सहज अवस्था में टिका रहता है।```
```प्रभु का स्मरण करने से मनुष्य का (मन रूपी) आसन डोलता नहीं और उसके (हृदय का) कमल-फूल खिला रहता है।```
```प्रभु का स्मरण करने से (मनुष्य के अंदर) एक-रस संगीत सा (होता रहता है), (भाव) प्रभु के स्मरण से जो सुख (उपजता) है वह (कभी) खत्म नहीं होता।```
```वही मनुष्य (प्रभु को) स्मरण करते हैं, जिस पर प्रभु की मेहर होती है; हे नानक! (कोई भाग्यशाली) उन (स्मरण करने वाले) जनों की शरण पड़ता है।7।```

*हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥ हरि सिमरनि लगि बेद उपाए ॥ हरि सिमरनि भए सिध जती दाते ॥ हरि सिमरनि नीच चहु कुंट जाते ॥ हरि सिमरनि धारी सभ धरना ॥ सिमरि सिमरि हरि कारन करना ॥ हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा ॥ हरि सिमरन महि आपि निरंकारा ॥ करि किरपा जिसु आपि बुझाइआ ॥ नानक गुरमुखि हरि सिमरनु तिनि पाइआ ॥८॥१॥*

हरि सिमरनु = प्रभु का स्मरण। करि = कर के। प्रगटाए = मशहूर हुए। हरि सिमरनि = प्रभु के स्मरण में। लगि = लग के, जुड़ के। उपाए = पैदा किए। भए = हो गए। सिध = वह पुरुष जो साधना द्वारा आत्मिक अवस्था के शिखर तक पहुँच गए। जती = अपनी शारीरिक इंद्रियों को वश में रखने वाला। चहु कुंट = चारों तरफ, सारे जगत में। जाते = मशहूर। सिमरनि = स्मरण ने। धारी = टिकाई। धरना = धरती। कारन करन = जगत का कारन, जगत का मूल, सृष्टि का करता। आकारा = दृष्टिमान जगत। महि = में। जिसु = जिस को। नानक = हे नानक! तिनि = उस मनुष्य ने। गुरमुखि = गुरु के द्वारा।8।

```प्रभु का स्मरण करके भक्त (जगत में) मशहूर होते हैं, स्मरण में ही जुड़ के (ऋषियों ने) वेद (आदि धर्म पुस्तकें) रचीं।```
```प्रभु के स्मरण द्वारा ही मनुष्य सिद्ध बन गए, जती बन गए, दाते बन गए; नाम जपने की इनायत से नीच मनुष्य सारे संसार में प्रगट हो गए।```
```प्रभु के स्मरण ने सारी धरती को आसरा दिया हुआ है; (इसलिए, हे भाई!) जगत के कर्ता प्रभु को सदा स्मरण कर।```
```प्रभु ने स्मरण के वास्ते सारा जगत बनाया है; जहाँ स्मरण है वहाँ निरंकार स्वयं बसता है।```
```मेहर करके जिस मनुष्य को (स्मरण करने की) समझ देता है, हे नानक! उस मनुष्य ने गुरु के द्वारा स्मरण (की दाति) प्राप्त कर ली है।8।1।```

*सलोकु ॥ दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ ॥ सरणि तुम्हारी आइओ नानक के प्रभ साथ ॥१॥*

दीन = गरीब, कंगाल, कमजोर। भंजना = तोड़ने वाला, नाश करने वाला। घटि = घट में, शरीर में। घटि घटि = हरेक शरीर में (व्यापक)। नाथ = मालिक, पति। अनाथ = यतीम। नाथ = अनाथों का नाथ। आइओ = आया हूँ। प्रभ = हे प्रभु! नानक के साथ = गुरु के साथ, गुरु की चरणी पड़ के।1।

```दीनों के दर्द और दुखों का नाश करने वाले हे प्रभु! हे हरेक शरीर में व्यापक हरि! हे अनाथों के नाथ!```
```हे प्रभु! गुरु नानक का पल्ला पकड़ के मैं तेरी शरण आया हूँ।1।```